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बलौदाबाजार हिंसा के 2 साल : भवन के दाग धुले- ‘मन’ के बाकी, जलाए गए सैकड़ों वाहनों के मालिकों को मुआवजे का इंतजार

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बलौदाबाजार जिले में आगजनी और हिंसा कांड को दो वर्ष पूरे। सरकारी भवनों की मरम्मत हो चुकी है, घटना में निजी वाहन गंवाने वाले कर्मचारी और नागरिक मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं।

 

 

 

– बलौदा बाजार। 10 जून 2024 को बलौदाबाजार जिले में हुई आगजनी और हिंसा की घटना को आज दो वर्ष पूरे हो गए हैं। इस घटना ने न केवल जिले की प्रशासनिक व्यवस्था को झकझोर दिया था, बल्कि सैकड़ों लोगों को आर्थिक और मानसिक रूप से भी गहरा आघात पहुंचाया था। घटना के बाद 13 एफआईआर दर्ज की गईं, 200 से अधिक लोगों की गिरफ्तारियां हुईं और मामले की सुनवाई आज भी न्यायालय में जारी है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनकी पीड़ा समय के साथ कहीं दबकर रह गई और जिनकी सुध लेने वाला आज तक कोई नहीं है।

 

 

आगजनी की घटना में जल गए थे कई वाहन

दो वर्ष बाद जब इस घटना को याद किया जाता है, तो आमतौर पर चर्चा आगजनी, हिंसा, गिरफ्तारियों और न्यायिक प्रक्रिया की होती है। लेकिन उन कर्मचारियों और आम नागरिकों की तकलीफ शायद ही कभी चर्चा का विषय बनती है, जिनके निजी वाहन उस दिन आग की भेंट चढ़ गए थे। इनमें बड़ी संख्या संयुक्त जिला कार्यालय परिसर में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों की थी।

 

 

 

आफिस जाने वालों की कमाई का साधन बन गए थे वाहन

घटना के दौरान संयुक्त जिला कार्यालय परिसर में खड़े सैकड़ों दोपहिया और चारपहिया वाहन जलकर खाक हो गए थे। इनमें पुलिस विभाग के सिपाहियों से लेकर निरीक्षक और डीएसपी स्तर तक के अधिकारियों के वाहन शामिल थे। इसके अलावा विभिन्न विभागों में कार्यरत लिपिक, सहायक कर्मचारी, चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तथा अन्य अधिकारी-कर्मचारी भी प्रभावित हुए थे।

 

 

 

दो साल बाद भी नहीं मिली राहत, कर्मचारियों में आक्रोश

कई ऐसे कर्मचारी थे जो प्रतिदिन दूर-दराज के गांवों और कस्बों से अपने निजी वाहनों से कार्यालय आते-जाते थे। आगजनी की घटना में उनकी वर्षों की मेहनत और बचत से खरीदी गई गाड़ियां कुछ ही मिनटों में राख में तब्दील हो गईं। घटना के बाद शासन स्तर पर जले हुए वाहनों का पंचनामा तैयार किया गया। नुकसान का आकलन किया गया और संबंधित रिपोर्ट भी शासन को भेजी गई। लेकिन पीड़ित कर्मचारियों का कहना है कि दो वर्ष बीत जाने के बाद भी उन्हें उनकी निजी क्षति के एवज में कोई ठोस राहत नहीं मिली है।

 

 

 

बीमा से भी नहीं मिली पूरी राहत

कुछ वाहन मालिकों को बीमा कंपनियों से आंशिक सहायता प्राप्त हुई, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें या तो बीमा का लाभ नहीं मिला या फिर बहुत कम राशि मिली, जिससे वास्तविक नुकसान की भरपाई नहीं हो सकी। ऐसे कई कर्मचारी आज भी अपनी जली हुई गाड़ियों के नुकसान का बोझ उठा रहे हैं।

 

आज तक नहीं प्राप्त हुई कोई सहायता

इस संबंध में कई कर्मचारियों से बातचीत की गई, लेकिन अधिकांश लोग कैमरे के सामने आने या सार्वजनिक रूप से बयान देने से बचते नजर आए। सरकारी सेवा में होने के कारण वे खुलकर अपनी नाराजगी व्यक्त नहीं करना चाहते। हालांकि अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने स्वीकार किया कि, आज तक उन्हें शासन की ओर से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं हुई है।

 

शासकीय दायित्वों के बीच जली गाड़ियां

पीड़ित कर्मचारियों का कहना है कि, उनकी गाड़ियां किसी निजी स्थान पर नहीं, बल्कि अपने शासकीय दायित्वों के निर्वहन के दौरान कार्यालय परिसर में खड़ी थीं। इसके बावजूद उनकी व्यक्तिगत क्षति की भरपाई के लिए अब तक कोई प्रभावी पहल नहीं की गई है। कई कर्मचारियों ने वाहन खरीदने के लिए ऋण लिया था, जिसकी किस्तें उन्हें वाहन जल जाने के बाद भी चुकानी पड़ीं।

 

शासन को भी हुआ था करोड़ों का नुकसान

इस पूरे घटनाक्रम में शासन को भी करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ था। संयुक्त जिला कार्यालय सहित अन्य शासकीय परिसरों में आगजनी और तोड़फोड़ से व्यापक क्षति पहुंची थी। बाद में शासन ने मरम्मत और पुनर्निर्माण कार्य कराकर भवनों को फिर से व्यवस्थित कर दिया। आज अधिकांश कार्यालय पहले की तरह संचालित हो रहे हैं और भवनों पर उस घटना के निशान भी लगभग मिट चुके हैं। लेकिन दूसरी ओर उन कर्मचारियों की व्यक्तिगत क्षति आज भी जस की तस बनी हुई है। जिन वाहनों के सहारे वे रोजी-रोटी और अपने दायित्वों का निर्वहन करते थे, उनके नुकसान की भरपाई आज तक नहीं हो सकी है।

 

अनकही कहानियां और अनुत्तरित सवाल

दो वर्ष बाद भी संयुक्त जिला कार्यालय परिसर और अन्य स्थानों पर खड़े जले हुए वाहनों के अवशेष उस भयावह दिन की याद दिलाते हैं। वे केवल लोहे के जले हुए ढांचे नहीं हैं, बल्कि उन लोगों की अधूरी पीड़ा और अनुत्तरित सवालों के प्रतीक हैं, जो आज भी यह जानना चाहते हैं कि उनकी मेहनत की कमाई से खरीदी गई संपत्ति के नुकसान की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा।

 

दो साल बाद भी अनुत्तरित है सवाल

घटना को दो वर्ष पूरे होने के अवसर पर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि, जब सार्वजनिक संपत्तियों की मरम्मत और पुनर्निर्माण संभव हो गया, तो उन कर्मचारियों और आम नागरिकों के निजी नुकसान की भरपाई के लिए अब तक कोई ठोस पहल क्यों नहीं हो सकी। यह प्रश्न आज भी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है