गिरफ्तारी और रिमांड की प्रक्रिया में पुलिस की लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोरबा के पुलिस अधीक्षक को महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि यदि कोई पुलिसकर्मी कानून या सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है तो केवल चेतावनी देकर मामला समाप्त नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में संबंधित पुलिसकर्मियों की कार्यप्रणाली पर लगातार निगरानी रखी जाए और गलती दोहराने पर सख्त विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कोरबा के किराना व्यापारी अजय अग्रवाल की याचिका की सुनवाई के दौरान की।
याचिकाकर्ता अजय अग्रवाल ने अदालत को बताया कि 29 मार्च 2016 को बालको थाना पुलिस बिना वारंट उनकी दुकान और घर में घुस गई। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने परिवार के सदस्यों के साथ की और घर में लगे सीसीटीवी कैमरों का डीर्व
व्यापारी का कहना था कि जब उन्होंने इस कार्रवाई की शिकायत की तो पुलिस ने उनकी शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय उनके परिवार के खिलाफ ही काउंटर केस दर्ज कर दिया।
मामले में पुलिस ने व्यापारी के गिरफ्तार पुत्र को न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष रिमांड के लिए पेश किया। सुनवाई के दौरान मजिस्ट्रेट ने पाया कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं थी। इसे देखते हुए अदालत ने पुलिस की रिमांड की मांग अस्वीकार कर दी थी।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी और रिमांड जैसी संवेदनशील प्रक्रियाओं में कानून का अक्षरशः पालन होना चाहिए। यदि किसी पुलिसकर्मी द्वारा नियमों या सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन किया जाता है, तो महज चेतावनी देकर उसे नहीं छोड़ा जा सकता।
खंडपीठ ने कोरबा एसपी को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में संबंधित पुलिसकर्मियों के आचरण पर नियमित निगरानी रखी जाए और यदि दोबारा ऐसी लापरवाही सामने आती है तो उनके खिलाफ कठोर विभागीय कार्रवाई की जाए।





