जिस आंगन में कभी दीपक की हंसी गूंजती थी, वहां आज सन्नाटा पसरा है। घर के दरवाजे पर बैठी उसकी बूढ़ी नानी की निगाहें अब भी उसी रास्ते पर टिकी हैं, जहां से उन्हें लगता है कि दीपक लौट आएगा। परिवार के लोग बार-बार समझा रहे हैं कि अब दीपक कभी वापस नहीं आएगा, लेकिन नानी को अब भी यकीन नहीं हो रहा कि उनका नाती आतंकियों की गोली का शिकार हो चुका है।
दरअसल, शुक्रवार देर शाम जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले में आतंकियों ने छत्तीसगढ़ के 2 मजदूरों की गोली मारकर हत्या कर दी। मृतकों में सक्ती जिले का दीपक रात्रे (24) भी शामिल था। दैनिक भास्कर की टीम दीपक के घर हरदीडीह पहुंची।
परिवार वालों का कहना है कि बिना परिजनों की सहमति के दीपक का जम्मू-कश्मीर में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया। मामा ने कहा कि उनके 2 भाई भी वहां मौजूद थे, लेकिन उनको भी आग देने नहीं दिया। बहन ने कहा कि राखी बांधना तो दूर, आखिरी बार भाई का चेहना भी नहीं देख पाई।परिवार वालों का कहना है कि बिना परिजनों की सहमति के दीपक का जम्मू-कश्मीर में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया। मामा ने कहा कि उनके 2 भाई भी वहां मौजूद थे, लेकिन उनको भी आग देने नहीं दिया। बहन ने कहा कि राखी बांधना तो दूर, आखिरी बार भाई का चेहना भी नहीं देख पाई।
दीपक की जिंदगी संघर्षों की लंबी कहानी रही है। उसके मामा दिलहरण कुमार सांडे ने बताया कि जब वह महज चार साल का था, तभी पिता का साया सिर से उठ गया। आर्थिक तंगी के कारण उसकी मां उसे लेकर अपने मायके पक्ष के गांव हरदीडीह आ गई।
यहीं नानी और मामा के सहारे उसका बचपन बीता। अभावों के बीच उसने स्कूल की पढ़ाई की, लेकिन घर की जिम्मेदारियों ने जल्द ही उसके हाथों में किताबों की जगह मजदूरी का औजार थमा दिया।
गांव के मामा और दीपक के दोस्त भरत भूषण रात्रे ने बताया कि रोज कमाना और रोज खाना ही दीपक के परिवार की जिंदगी बन गई थी। मेहनत-मजदूरी करते हुए दीपक ने किसी तरह अपना घर बसाने का सपना देखा। करीब 2 साल पहले उसकी शादी हुई, लेकिन






