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बच्चे को लेकर प्रेमी के साथ भागी मां : पिता ने पुलिस की कार्यवाही पर उठाए सवाल, 62 हजार खर्च कराने का भी आरोप

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धमतरी जिले में 5 वर्षीय बच्चे की कस्टडी को लेकर पुलिस पर गंभीर आरोप लगे हैं। पिता का दावा है कि, 62 हजार खर्च करवाने के बाद भी बेटा वापस नहीं मिला।

 

। धमतरी जिले के ग्राम खर्रा से सामने आया एक मामला पुलिस की जांच प्रक्रिया और संवेदनशील मामलों में निर्णय क्षमता पर गंभीर प्रश्न उठाता है। 5 वर्षीय बच्चे को पिता से अलग करने, बरामदगी के बाद सुपुर्दगी न देने और जांच का खर्च पीड़ित से वसूलने जैसे आरोपों ने परिवार को ही नहीं, प्रशासन को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है।

 

पत्नी और 5 वर्षीय बच्चे के गायब होने से शुरू हुआ विवाद

 

 

ग्राम खर्रा निवासी सुरेश साहू के अनुसार, 14 जून 2025 को उसकी पत्नी नूतन साहू 5 वर्षीय पुत्र उमंग साहू के साथ 1.70 लाख रुपये नकद और लगभग 2 लाख के जेवर लेकर घर से गायब हो गई। सुरेश ने बिरेझर चौकी में अपहरण की आशंका बताई, लेकिन पुलिस ने इसे गुमशुदगी के मामले (गुम इंसान क्रमांक 48/2025) के रूप में दर्ज कर लिया। इसी निर्णय पर पीड़ित ने सबसे पहले सवाल उठाए।

पुलिस की बरामदगी कार्रवाई पर उठे सवाल

मोबाइल लोकेशन के आधार पर पुलिस टीम पंजाब के श्री मुक्तसर जिले पहुंची, जहाँ केवल सिंह नामक व्यक्ति के पास से महिला और बच्चा बरामद हुआ। पुलिस दस्तावेजों में महिला के प्रेम-प्रसंग और ‘अपनी इच्छा से रहने’ की बात दर्ज की गई है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या एक 5 वर्षीय नाबालिग अपनी मर्जी खुद तय कर सकता है? और किस कानूनी आधार पर बच्चे को उसके पिता की उपस्थिति में एक अजनबी के सुपुर्द कर दिया गया?

 

दस्तावेजों में ‘पिता को सुपुर्द’, असल में बच्चा नहीं मिला

दस्तावेजों में बच्चे को पिता को सौंपे जाने का उल्लेख है, पर वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट है। सुरेश का कहना है कि वह मौके पर मौजूद था, बेटा उसे देखकर रो पड़ा और साथ आने की जिद कर रहा था, लेकिन पुलिस ने उसे नहीं दिया। यह विरोधाभास जांच की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

 

 

पीड़ित से 62 हजार रुपये खर्च करवाए गए

सुरेश साहू का आरोप है कि पंजाब तक की यात्रा, रहना, खाना और अन्य खर्च का पूरा बोझ पुलिस ने उसी पर डाल दिया। उसके अनुसार लगभग 62,000 रुपये खर्च हुए। सवाल यह है कि क्या अब जांच का खर्च भी पीड़ित से ही लिया जाएगा? यह आरोप सामान्य प्रक्रिया से बिल्कुल विपरीत है और कार्रवाई की पारदर्शिता को लेकर गंभीर संदेह पैदा करता है।

 

बाल संरक्षण कानूनों के अनुपालन पर प्रश्न

एक 5 साल के बच्चे की कस्टडी तय करने में बाल कल्याण समिति या न्यायालय की भूमिका आवश्यक होती है। लेकिन इस मामले में न तो बच्चा छत्तीसगढ़ लाया गया, न ही किसी विधिक प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किया गया। क्या बाल संरक्षण अधिनियम के दिशा-निर्देशों का पालन हुआ? यह अब बड़ा विवाद का विषय है।

 

पीड़ित की मांग- बच्चे की सुपुर्दगी

सुरेश साहू ने कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, एसडीएम और बाल कल्याण समिति को ज्ञापन सौंपकर अपने पुत्र की सुपुर्दगी, 62 हजार रुपये की वापसी और पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग की है। मामला अब प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुका है।

 

 

पुलिस का पक्ष

पुलिस का कहना है कि, कोई गलत कार्रवाई नहीं की है। पुलिस पर लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह गलत हैं, वह भी घटना के इतने दिनों बाद। अगर वे पुलिस की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हैं तो कोर्ट की शरण ले सकते हैं।