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बस्तर की साहित्यिक चेतना को राष्ट्रीय मंच पर सम्मान: हिंदी पत्रकारिता शताब्दी समारोह की राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करेंगे डॉ. राजाराम त्रिपाठी”

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खबर विशेष: *”बस्तर की साहित्यिक चेतना को राष्ट्रीय मंच पर सम्मान: हिंदी पत्रकारिता शताब्दी समारोह की राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करेंगे डॉ. राजाराम त्रिपाठी”*

 

‘बस्तर बोल रहा हूं’ के रचनाकार और ‘ककसाड़’ के संपादक डॉ. राजाराम त्रिपाठी को ‘कोलकाता’ में हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता का दायित्व।

 

प्रमुख बिंदु :

 

*हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी पर कोलकाता में ‘भारतीय भाषा परिषद’ के सभागार में राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता करेंगे डॉ. राजाराम त्रिपाठी।*

 

*”भारतीय भाषा परिषद” तथा हिंदी शोध पत्रिका पैरोकार के संयुक्त तत्वाधान में संपन्न हो रहा द्विशताब्दी समारोह,*

 

*200 साल पहले कोलकाता से ही उदंत मार्तंड द्वारा हिंदी पत्रकारिता का हुआ था शुभारंभ,*

 

*जनजातीय सरोकारों की राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘ककसाड़’ के संपादक के रूप में 12 वर्षों से निभा रहे हैं महत्वपूर्ण भूमिका।*

 

*डॉ त्रिपाठी की ‘मैं बस्तर बोल रहा हूं’ तथा इसके अंग्रेजी एवं मराठी में अनुवादों, दुनिया इन दिनों एवं ‘गांडा’ जैसी किताबों को देशभर में मिली व्यापक सराहना।*

 

*साहित्यके साथ ही जैविक कृषि, हर्बल खेती,जनजातीय सेवा और ग्रामीण कृषि नवाचारों के लिए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान।*

 

 

हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में

‘भारतीय भाषा परिषद’ और हिंदी साहित्यिक शोध पत्रिका ‘पैरोकार’ के संयुक्त तत्वावधान में द्विशताब्दी हिंदी पत्रकारिता और बंगीय विरासत पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जा रही है।

आयोजित किए जा रहे ऐतिहासिक “हिंदी पत्रकारिता द्वि-शताब्दी समारोह (1826-2026)” के अंतर्गत 9 जून 2026 को कोलकाता में होने वाली राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता का दायित्व बस्तर के प्रख्यात साहित्यकार, चिंतक, जनजातीय सरोकारों के संवाहक एवं वरिष्ठ पत्रकार डॉ. राजाराम त्रिपाठी को सौंपा गया है। इस समाचार से बस्तर सहित समूचे छत्तीसगढ़ के साहित्यिक, पत्रकारिता और बौद्धिक जगत में हर्ष और गौरव का वातावरण है।

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के सभागार में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का विषय होगा, “द्वि-शताब्दी हिंदी पत्रकारिता और बंगीय विरासत”। यह आयोजन हिंदी पत्रकारिता की गौरवशाली यात्रा के 200 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर देशभर के प्रमुख साहित्यकारों, पत्रकारों, संपादकों और चिंतकों को एक मंच पर लाने जा रहा है।

कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार एवं छपते-छपते के संपादक श्री विश्वम्भर नेवर मुख्य अतिथि होंगे। सुप्रसिद्ध साहित्यकार “भारतीय भाषा परिषद” के निदेशक तथा लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका वागर्थ के संपादक डॉ. शंभुनाथ बीज वक्तव्य देंगे। वहीं राज मंगोलिया, शकुन त्रिवेदी, जितेन्द्र जितांशु, संतोष सिंह, शाहनवाज अख्तर तथा रेशमी पांडा मुखर्जी विशिष्ट अतिथि एवं वक्ता के रूप में अपने विचार रखेंगे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. अभिज्ञात करेंगे। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार श्री संतन कुमार पाण्डेय को पैरोकार लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड तथा श्री गंगा प्रसाद को पैरोकार पत्रकारिता शिखर सम्मान प्रदान किया जाएगा। इ पैरोकार पत्रिका के संपादक अनवर हुसैन इस आयोजन की संयोजक है तथा केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं, पैरोकार की टीम भी अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इस कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटी हुई है। चूंकि हिंदी का पहला समाचार पत्र 200 साल पहले उदंत मार्तंड कलकत्ता से ही 30 मई 1826 को कोलकाता से ही प्रकाशित हुआ था। इसलिए इस संबंध में कोलकाता का विशेष महत्व है।

 

डॉ. राजाराम त्रिपाठी का कार्यक्रम अध्यक्ष हेतु चयन केवल एक साहित्यकार या संपादक के रूप में नहीं, बल्कि जनजातीय भारत की आवाज़ को राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचाने वाले एक प्रतिबद्ध बौद्धिक व्यक्तित्व के रूप में देखा जा रहा है। विगत बारह वर्षों से वे जनजातीय सरोकारों की राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘ककसाड़’ का संपादन कर रहे हैं, जिसने आदिवासी समाज, उनकी संस्कृति, समस्याओं, संघर्षों और उपलब्धियों को देश के सामने गंभीरता से प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है।

डॉ. त्रिपाठी की चर्चित काव्य कृति ‘मैं बस्तर बोल रहा हूं’ ने देशभर के पाठकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। बस्तर के सामाजिक यथार्थ, जनजातीय जीवन की पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान को स्वर देती इस कृति की लोकप्रियता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसका अंग्रेजी अनुवाद “Yes, Bastar is Speaking” तथा मराठी अनुवाद “मी आदिवासी बोलतोय” शीर्षक से प्रकाशित करना पड़ा। मराठी के वरिष्ठ साहित्यकार संजय जगताप द्वारा किया गया यह अनुवाद महाराष्ट्र में भी अत्यंत चर्चित और लोकप्रिय रहा।

उनके संपादकीय लेखों का संग्रह ‘दुनिया इन दिनों’ भी पाठकों और चिंतकों के बीच व्यापक रूप से सराहा गया। हाल ही में प्रकाशित उनका शोधग्रंथ ‘गांडा अनुसूचित जाति या जनजाति?’ अकादमिक एवं बौद्धिक जगत में गंभीर विमर्श का विषय बना हुआ है। सामाजिक न्याय, जनजातीय इतिहास और नीतिगत प्रश्नों पर यह अध्ययन महत्वपूर्ण हस्तक्षेप माना जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि डॉ. राजाराम त्रिपाठी केवल साहित्य और पत्रकारिता तक सीमित नहीं हैं। वे जैविक कृषि, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जनजातीय उत्थान के क्षेत्र में भी देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। बस्तर में जैविक खेती के प्रसार, किसानों के सशक्तिकरण, आदिवासी समुदायों की आजीविका संवर्धन तथा कृषि नवाचारों के लिए उनका योगदान व्यापक रूप से सराहा गया है। विशेष रूप से उच्च उत्पादकता वाली काली मिर्च की किस्मों के विकास, प्राकृतिक कृषि मॉडल तथा आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका आधारित विकास के उनके प्रयासों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई है।

साहित्यिक और वैचारिक जगत के जानकारों का मानना है कि हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी जैसे ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता के लिए डॉ. राजाराम त्रिपाठी का चयन न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान का सम्मान है, बल्कि बस्तर की उस साहित्यिक चेतना और जनजातीय संवेदना का भी सम्मान है, जो लंबे समय से देश के सांस्कृतिक विमर्श को नई दृष्टि प्रदान करती रही है।

कोलकाता में होने वाला यह आयोजन निश्चित रूप से हिंदी पत्रकारिता, भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के बीच संवाद का एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच सिद्ध होगा, जिसमें बस्तर की आवाज़ को भी प्रमुखता से सुना जाएगा।