बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला आया है। प्रदेश के सभी निजी, सहायता प्राप्त और आंशिक सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों पर अब कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948 (ईएसआईसी कानून) लागू होगा। कोर्ट ने अलग-अलग स्कूलों की याचिकाओं को खारिज करते हुए साफ कर दिया कि यह कानून कर्मचारियों के हित में है और इसे मानना अनिवार्य होगा। दरअसल प्रदेश सरकार ने 27 अक्टूबर 2005 को अधिसूचना जारी कर शैक्षणिक संस्थानों को भी ईएसआईसी एक्ट के दायरे में लाने का निर्णय लिया था। इसके तहत 20 या उससे ज्यादा कर्मचारियों वाले स्कूलों को 1 अप्रैल 2006 से इस कानून का पालन करना जरूरी किया गया था। 2011 में ईएसआईसी ने योगदान राशि जमा करने के लिए नोटिस जारी किया, तो कई स्कूलों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता स्कूलों का कहना था कि शिक्षा देना कोई व्यापार या औद्योगिक गतिविधि नहीं है। इसलिए स्कूलों को “एस्टेब्लिशमेंट” की श्रेणी में लाकर ईएसआईसी एक्ट लागू करना गलत है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया कि शिक्षा सेवा कार्य है, इसे बिजनेस की तरह नहीं देखा जा सकता। वहीं राज्य सरकार और ईएसआईसी कॉर्पोरेशन ने दलील दी कि स्कूलों में भी बड़ी संख्या में कर्मचारी काम करते हैं, जिन्हें बीमारी, मातृत्व और दुर्घटनाओं की स्थिति में सामाजिक सुरक्षा मिलना चाहिए। यही इस कानून का उद्देश्य है। हाईकोर्ट ने सरकार की दलील को सही मानते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थान भी “एस्टेब्लिशमेंट” की परिभाषा में आते हैं। इसलिए ईएसआईसी एक्ट लागू होगा और कर्मचारियों को इसका लाभ मिलेगा।
इस फैसले का असर प्रदेश के करीब आठ हजार निजी और सहायता प्राप्त स्कूलों पर पड़ेगा। इनमें 5680 निजी, 738 सहायता प्राप्त, 413 आंशिक सहायता प्राप्त और 180 अन्य स्कूल शामिल हैं। इन संस्थानों में काम करने वाले लगभग 96,500 कर्मचारियों को ईएसआईसी का लाभ मिलेगा। इसमें 50 हजार से अधिक गैर-शैक्षणिक कर्मचारी भी हैं। सरकार का कहना है कि ईएसआईसी पॉलिसी कर्मचारियों के लिए सुरक्षा कवच है। बीमारी, मातृत्व और दुर्घटनाओं की स्थिति में यह बड़ा सहारा बनेगी और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।




