परशुराम जयंती पर विशेष लेख : *“परशुराम की परंपरा और आज का ब्राह्मण: आत्ममंथन और आगे का रास्ता”*
लेखक: डॉ राजाराम त्रिपाठी, सामाजिक चिंतक तथा ‘अंतरराष्ट्रीय ब्राह्मण संगठन’ के सलाहकार हैं।
*ब्राह्मण परंपरा ने सदैव जाति नहीं, योग्यता को पूजा है; तभी राम और कृष्ण भगवान बने, केवल परशुराम नहीं,*
*स्वतंत्रता संग्राम में निर्णायक बौद्धिक नेतृत्व, पर आज राजनीति में सीमितव सिकुड़ता प्रभाव,*
*कम जनसंख्या (4-5%) और आंतरिक विखंडन, आकाशचुम्बी अहंमन्यता के कारण उत्तरोत्तर कमजोर होती राजनीतिक स्थिति,*
*बढ़ती सामाजिक आलोचना और “सामूहिक दोषारोपण” की प्रवृत्ति ब्राह्मणों के साथ ही समाज तथा समग्र राष्ट्र के लिए भी चिंताजनक,*
*समाधान राजनीति नहीं, ज्ञान, समरसता और आत्मसुधार में निहित,*
भारत के सामाजिक इतिहास में ब्राह्मण की भूमिका एक ऐसे दीपक की रही है, जो स्वयं जलकर समाज को प्रकाश देता रहा। परशुराम जयंती के इस अवसर पर यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि गहरे आत्ममंथन का विषय है कि क्या वह दीपक आज भी प्रकाश दे रहा है, या स्वयं धुएं में घिर गया है।
स्वतंत्रता आंदोलन के समय का भारत देखें तो स्पष्ट होता है कि ब्राह्मण वर्ग केवल धार्मिक कर्मकांड का संरक्षक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का संवाहक था। बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, मदन मोहन मालवीय और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे नाम इस बात के प्रमाण हैं कि यह वर्ग विचार, शिक्षा और संघर्ष तीनों का केंद्र था। स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इसी परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिन्होंने संस्थाओं के निर्माण में बौद्धिक दृष्टि दी।
किन्तु स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र में वोट के गणित ने सामाजिक संरचना को नए सिरे से परिभाषित किया। संख्या, समीकरण और संगठित वोट बैंक राजनीति का आधार बने। लगभग 4 से 5 प्रतिशत जनसंख्या वाला ब्राह्मण वर्ग इस गणित में स्वाभाविक रूप से पीछे छूटता गया। संसद में उसका प्रतिनिधित्व, जो शुरुआती दशकों में 15 से 20 प्रतिशत तक माना जाता था, आज घटकर लगभग 5 से 7 प्रतिशत के बीच सिमट गया है और निरंतर नीचे जा रहा है। उत्तर भारत में जहां कभी वह निर्णायक प्रभाव रखता था, वहीं आज वह “स्विंग वोटर” बनकर रह गया है, जबकि दक्षिण भारत में, विशेषकर तमिलनाडु में, उसका राजनीतिक प्रभाव लगभग समाप्त हो चुका है।
परंतु यह केवल बाहरी परिघटना नहीं है। ब्राह्मण समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जब भी उसे सत्ता या पद मिला, उसने सबसे पहले अपने समाज से दूरी बना ली। वह व्यक्तिगत योग्यता से ऊपर उठता है, पर सामूहिक चेतना से कट जाता है। परिणाम यह हुआ कि राजनीति में जाकर भी वह अपने वर्ग के लिए संगठित शक्ति कभी नहीं बन पाया, जबकि अन्य वर्गों ने राजनीति को अपने सामाजिक सशक्तिकरण, सर्वविध उन्नति का प्रभावी माध्यम बनाया।
यहीं एक गहरी और अक्सर अनदेखी सच्चाई सामने आती है। ब्राह्मण परंपरा का मूल स्वभाव जातिगत आग्रह नहीं, बल्कि योग्यता-आधारित स्वीकार्यता रहा है। यही कारण है कि भारतीय समाज के सबसे प्रतिष्ठित देवस्थल और आराध्य केवल ब्राह्मण अथवा किसी एक जाति के प्रतिनिधि नहीं हैं। भगवान राम, जो क्षत्रिय वंश में जन्मे, उन्हें “मर्यादा पुरुषोत्तम” के रूप में प्रतिष्ठा मिली, और उनके मंदिर उत्तर से दक्षिण तक बने। भगवान कृष्ण, जो यदुवंशी थे, उन्हें “पूर्णावतार” के रूप में स्वीकार किया गया, और द्वारका से लेकर वृंदावन और जगन्नाथ पुरी तक उनकी भक्ति का विस्तार हुआ। रामायण की रचना वाल्मीकि ने की और तुलसीदास ने उसे जन-जन तक पहुंचाया। हर ब्राह्मण परिवार में यदुकुलनंदन की “भगवद-गीता”और सूर्यवंशी क्षत्रिय इक्ष्वाकु कुलभूषण रघुकुल नन्दन की रामकथा का होना इस व्यापक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
यहां प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि ब्राह्मण केवल जाति-केन्द्रित होते, तो क्या वे अपने ही कुल के महापुरुष भगवान परशुराम को ही सर्वाधिक स्थापित नहीं करते? इतिहास में परशुराम के मंदिर हमें प्रायः दिखाई नहीं देते हैं, जबकि राम और कृष्ण के मंदिर पूरे देश में फैले हैं? इसका उत्तर यही है कि ब्राह्मण परंपरा ने सदैव गुण, धर्म और लोकहित को प्राथमिकता दी, न कि केवल जातिगत पहचान को। उसने समाज के लिए जो सर्वोत्तम लगा, उसे ही प्रतिष्ठित किया।
आज जब ब्राह्मण समाज पर सामूहिक दोषारोपण की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब इस ऐतिहासिक संतुलन को समझना और भी आवश्यक हो जाता है। समाज के अनेक वर्ग अपनी ऐतिहासिक पीड़ाओं और वर्तमान समस्याओं का कारण ब्राह्मण को मानने लगे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल बौद्धिक रूप से कमजोर है, बल्कि न्याय के मूल सिद्धांतों के भी सर्वथा विरुद्ध है। दुनिया की कोई भी निष्पक्ष न्याय व्यवस्था यह स्वीकार नहीं कर सकती कि किसी व्यक्ति को उसके कथित पूर्वजों के कथित कर्मों के लिए, वह भी हजारों वर्षों बाद, दंडित किया जाए।
वोट की कुत्सित राजनीति ने प्रायः इस विलगाव तथा प्रतिशोधात्मक प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। यदि कानून और नीतियों का उपयोग संतुलन के बजाय प्रतिशोध के औजार के रूप में किया जाएगा, तो उससे अस्थायी सत्ता तो मिल सकती है, पर समाज की समरसता और विकास को स्थायी क्षति पहुंचती है। किसी भी वर्ग के साथ अन्याय अंततः पूरे समाज के संतुलन को बिगाड़ता है। एक मजबूत स्थायी राष्ट्र की अवधारणा के लिए भी या प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है।
ऐसे समय में भगवान परशुराम का स्मरण एक नए अर्थ में किया जाना चाहिए। परशुराम केवल शक्ति के प्रतीक नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व और संतुलन के प्रतीक हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस में उनके प्रसंग के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि हर युग का अपना धर्म होता है। जब परशुराम का दायित्व पूर्ण होता है, तो राम का युग प्रारंभ होता है। यह परिवर्तन ही भारतीय संस्कृति की जीवंतता है।
आज ब्राह्मण समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। उपजातियों में विभाजन, अहंकार और सर्वमान्य नेतृत्व का अभाव उसे कमजोर बनाता है। संगठन बनते हैं, पर टिकते नहीं; हर व्यक्ति नेतृत्व चाहता है, पर अनुशासन कम ही दिखाई देता है। ऐसे में राजनीति में प्रभावी भूमिका की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है।
इसलिए यह विचार गंभीरता से लिया जाना चाहिए कि क्या अब ब्राह्मण को अपनी ऊर्जा राजनीति में खपाने के बजाय ज्ञान, शिक्षा और बौद्धिक नेतृत्व में लगानी चाहिए। दक्षिण भारत के अनेक ब्राह्मण युवाओं ने वैश्विक स्तर पर विज्ञान, तकनीक और प्रबंधन में जो स्थान बनाया है, वह इस दिशा का स्पष्ट संकेत है। सम्मान और प्रभाव अंततः योग्यता से आता है, न कि केवल राजनीतिक पद से।
अंततः, ब्राह्मण की परिभाषा जन्म से नहीं, कर्म से तय होगी। “ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मणः” केवल श्लोक नहीं, बल्कि एक दायित्व है। यदि ब्राह्मण इस दायित्व को पुनः स्वीकार करता है, तो वह फिर से समाज का पथप्रदर्शक बन सकता है।
परशुराम जयंती केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक अवसर है यह समझने का कि शक्ति, शस्त्र तथा शास्त्र का उपयोग कब और कैसे करना है, और उससे भी अधिक यह कि कब उसे त्यागकर नई पीढ़ी को स्थान देना है। भारत को आज भी ब्राह्मण की आवश्यकता है, पर वह ब्राह्मण जो अपने लिए नहीं, बल्कि सबके लिए सोचता हो। यही भगवान परशुराम की सच्ची परंपरा है, और यही भारत के संतुलित भविष्य की दिशा भी।





