Acn18. Com.*पांच चिंताजनक तथ्य :-*
1. भारत में औसतन 45 हजार नागरिकों पर मात्र एक न्यायाधीश।
2. 30 जुलाई 2026 तक देश की अदालतों में लगभग 5.65 करोड़ मुकदमे लंबित थे।
3. जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में ही 4.99 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित थे।
4. देश की जेलों में लगभग चार लाख विचाराधीन कैदी हैं, जो कुल कैदियों का लगभग 73 प्रतिशत हैं। (NCRB, 2024)
5. संविधान के अनुच्छेद 39(क) और विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के बावजूद गरीबों को गुणवत्तापूर्ण और समयबद्ध न्याय दिलाना आज भी बड़ी चुनौती है।
भारत में न्याय को संविधान की आत्मा और लोकतंत्र का सबसे मजबूत आधार माना जाता है। संविधान का अनुच्छेद 39(क) राज्य को निर्देश देता है कि आर्थिक अथवा अन्य अक्षमताओं के कारण कोई नागरिक न्याय पाने के अवसर से वंचित न रहे। इसके लिए राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) से लेकर जिला स्तर तक मुफ्त कानूनी सहायता की व्यवस्था है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कानून की किताबों में दर्ज यह खूबसूरत संकल्पना वास्तव में उस अंतिम आदमी तक पहुंच पाई है, जिसके लिए इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है? राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस पर सरकारी सभागारों में आयोजन, भाषण और विधिक जागरूकता के संकल्प दोहराने से पहले हमें इस प्रश्न का ईमानदारी से सामना करना चाहिए।
न्याय विभाग के अनुसार 28 फरवरी 2026 को देश में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 25,894 के मुकाबले केवल 21,027 न्यायाधीश कार्यरत थे। न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात लगभग 22 प्रति दस लाख आबादी है। अर्थात औसतन 45 हजार नागरिकों के हिस्से में एक न्यायाधीश! राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के अनुसार 30 जुलाई 2026 तक सर्वोच्च न्यायालय में 95,954, उच्च न्यायालयों में 64,66,970 और जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में 4,99,11,920 मुकदमे लंबित थे। कुल मिलाकर लगभग 5.65 करोड़ मुकदमे! इनमें लगभग पांच करोड़ मामले निचली अदालतों में हैं। यह केवल आंकड़ा नहीं, करोड़ों परिवारों की प्रतीक्षा, पीड़ा और अनिश्चित भविष्य की कहानी है।
भारत की कानूनी व्यवस्था भी अपने आप में एक जटिल भूलभुलैया है। सैकड़ों केंद्रीय अधिनियम, राज्य कानून, नियम, विनियम और उपविधियां मिलकर ऐसा कानूनी जाल बनाते हैं कि सामान्य नागरिक तो दूर, कानून के जानकारों के लिए भी इसकी सभी परतें समझना आसान नहीं। अमेरिका और यूरोप के कई देशों की तरह भारत में टॉर्ट लॉ (Law of Torts) का कोई व्यापक, एकीकृत संहिताबद्ध कानून नहीं है। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं कि भारत में अपकृत्य कानून लागू ही नहीं है। यह न्यायिक निर्णयों और कॉमन लॉ की परंपरा से विकसित हुआ है। कानूनों की संख्या और जटिलता बढ़ती गई, लेकिन न्याय तक पहुंचने की प्रक्रिया सरल नहीं हो पाई।
ग्रामीण भारत में तो मुकदमेबाजी कई बार विरासत में मिलती है। किसान के घर जब बच्चा पैदा होता है, तो संभव है कि उसके पिता और दादा की आधा दर्जन जमीनों के विवाद भी उसके हिस्से में पहले से दर्ज हों। वह होश संभालने से पहले ही पुश्तैनी मुकदमों का वारिस बन जाता है और कई बार मुकदमों की तारीखें देखते-देखते ही जीवन से विदा हो जाता है। हमारी न्याय व्यवस्था की विडंबना देखिए कि यहां कई बार मृत व्यक्ति को भी यह साबित करने के लिए अदालतों और दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं कि वह मर चुका है और जीवित व्यक्ति को यह प्रमाणित करना पड़ता है कि वह जीवित है। जमीन के बंटवारे, नामांतरण, सीमांकन और अभिलेखों के सुधार में पीढ़ियां गुजर जाती हैं, लेकिन विवाद का अंत नहीं होता।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार गरीब और कमजोर नागरिक है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के अंतर्गत अनुसूचित जाति-जनजाति के सदस्य, मानव तस्करी अथवा बेगार के पीड़ित, महिलाएं, बच्चे, दिव्यांगजन, हिरासत में बंद व्यक्ति, औद्योगिक श्रमिक तथा निर्धारित आय सीमा से नीचे के पात्र नागरिक मुफ्त कानूनी सहायता प्राप्त कर सकते हैं। यह एक महत्वपूर्ण अधिकार है। लेकिन क्या केवल मुफ्त वकील उपलब्ध करा देने से न्याय सुनिश्चित हो जाता है? क्या हर नियुक्त वकील अपने मुवक्किल के मुकदमे में उसी लगन, तैयारी और समय से काम करता है, जिसकी अपेक्षा एक भुगतान करने वाला मुवक्किल करता है? अनेक वकील निष्ठापूर्वक यह जिम्मेदारी निभाते हैं, लेकिन व्यवस्था में निगरानी, जवाबदेही और सेवा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। मुफ्त कानूनी सहायता दया नहीं, नागरिक का अधिकार है।
वकालत की फीस के निर्धारण और पारदर्शिता के लिए भी प्रभावी व्यवस्था चाहिए। व्यवहार में मुवक्किल की आर्थिक हैसियत देखकर फीस तय होने और कई बार उसकी विवशता का अनुचित लाभ उठाए जाने की शिकायतें आम हैं। दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु होते ही मुआवजे के मुकदमों को हासिल करने के लिए कुछ वकीलों के बीच होने वाली खींचतान भी कम चिंताजनक नहीं। परिवार के शोक के समय रिश्तेदारी जैसा व्यवहार प्रदर्शित करके कानूनी प्रतिनिधित्व हासिल करने की होड़ तक देखने-सुनने में आती है। जब न्याय सेवा के बजाय मुवक्किल हासिल करने की प्रतिस्पर्धा बन जाए, तो पेशे की गरिमा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। छोटी अदालतों में कई बार वकील और मुवक्किल का रिश्ता ऐसा प्रतीत होता है, मानो चील और गोश्त का रिश्ता हो।
न्यायालयों में भ्रष्टाचार की शिकायतें इस संकट को और गहरा करती हैं। तारीख दिलाने के नाम पर कुछ न्यायालयीन कर्मचारियों द्वारा पैसे मांगे जाने की शिकायतें वर्षों से सुनने में आती रही हैं। कहीं सौ-दो सौ तो कहीं पांच सौ रुपये तक की अनौपचारिक वसूली की चर्चा होती है। रकम का प्रश्न नहीं, उस व्यवस्था का प्रश्न है जिसमें न्याय की चौखट पर खड़ा व्यक्ति पहले ही आर्थिक रूप से निचुड़ रहा होता है। यदि ऐसी शिकायतें सही हैं तो न्यायालय प्रशासन और संबंधित न्यायाधीशों की जिम्मेदारी है कि वे इनका संज्ञान लें और कठोर कार्रवाई करें। न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी है, लेकिन उसके तराजू के ठीक नीचे यदि भ्रष्टाचार पलता रहे तो निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
इससे भी गंभीर प्रश्न राजस्व न्यायालयों का है। देश के किसान का सबसे अधिक समय और पैसा तहसीलदार, नायब तहसीलदार और अनुविभागीय अधिकारी जैसे राजस्व न्यायालयों में खर्च होता है। जमीन का बंटवारा, नामांतरण, खसरा-दुरुस्ती, सीमांकन और बंदोबस्त जैसे सामान्य काम कई बार पीढ़ियों तक नहीं निपटते। कलेक्टर और राजस्व अधिकारियों, मंत्रियों तथा विधायकों की प्रशासनिक व्यस्तताओं में भी आम नागरिक की न्यायिक जरूरतें पीछे छूट जाती हैं। कभी वीआईपी प्रोटोकॉल, कभी अतिथियों की अगवानी, कभी अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां। जनता अपनी जमीन के अधिकार के लिए भटकती रहती है। ऑनलाइन व्यवस्था और डिजिटल रिकॉर्ड के दावे अपनी जगह हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रमाणीकरण से लेकर दस्तावेजों की प्रक्रिया तक अनौपचारिक भुगतान और बिचौलियों की शिकायतें समाप्त नहीं हुई हैं।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी लोकतंत्र का अत्यंत संवेदनशील प्रश्न है। विधायिका और कार्यपालिका का दबाव न्यायपालिका की निष्पक्षता को प्रभावित करे, यह किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं। जनवरी 2018 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों का सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने आकर न्यायालय के प्रशासनिक कामकाज पर चिंता जताना एक अभूतपूर्व घटना थी। इसने न्यायपालिका के भीतर संस्थागत चुनौतियों पर देशव्यापी बहस छेड़ दी थी। मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज कई बार अपनी शक्ति और प्रभाव के कारण बाकी संस्थाओं के सामने भी चुनौती बनकर खड़ा दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में संस्थाओं के बीच संतुलन, मर्यादा और जवाबदेही पहले से अधिक जरूरी हो जाती है।
न्याय व्यवस्था का एक और विरोधाभास देखिए। एक ओर ऐसे बड़े और महंगे वकील हैं जिनकी कानूनी दलीलों और तकनीकी पेचीदगियों के सहारे गंभीर अपराधों के आरोपी भी दोषमुक्त हो जाते हैं, वहीं दूसरी ओर लाखों विचाराधीन कैदी वर्षों तक जेलों में बंद रहते हैं। NCRB की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार देश की जेलों में 3,71,440 विचाराधीन कैदी थे, जो कुल कैदियों का लगभग 72.6 प्रतिशत थे। इनमें से हर व्यक्ति अपराधी नहीं है, क्योंकि दोष सिद्ध होने तक कानून उसे निर्दोष मानता है। यह स्थिति हमारी जमानत व्यवस्था, न्यायिक प्रक्रिया और गुणवत्तापूर्ण बचाव के अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
यह सही है कि फास्ट ट्रैक अदालतें, लोक अदालतें, मध्यस्थता और ऑनलाइन सुनवाई जैसी व्यवस्थाएं शुरू हुई हैं। लेकिन तकनीक तभी सार्थक है जब उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। केवल तारीख ऑनलाइन दिखाई देने से मुकदमा समाप्त नहीं होता और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से न्याय की गुणवत्ता अपने आप नहीं बढ़ जाती।
राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस को भी यदि हम सरकारी उत्सव, पोस्टर, बैनर, चाय-समोसे और औपचारिक भाषणों तक सीमित रखेंगे, तो परिस्थितियां नहीं बदलेंगी। न्यायाधीश एक-दूसरे की प्रशंसा करेंगे, वरिष्ठ अधिवक्ता अपने अनुभव सुनाएंगे और विधिक जागरूकता के संकल्प दोहराए जाएंगे। लेकिन जैसे ही कोई मजबूर नागरिक न्यायालय की चौखट पर पहुंचेगा, उसके सामने वही पुरानी चुनौतियां खड़ी होंगी।
परिवर्तन तभी आएगा जब सरकार, न्यायपालिका, अधिवक्ता समुदाय और समाज मिलकर यह संकल्प लें कि न्याय बिकने वाली वस्तु नहीं, नागरिक का अधिकार है। न्यायालयों में रिक्त पद भरे जाएं, राजस्व न्यायालयों को जवाबदेह बनाया जाए, मुफ्त कानूनी सहायता की गुणवत्ता की नियमित समीक्षा हो, अधिवक्ताओं के प्रशिक्षण और नैतिक आचरण को प्राथमिकता मिले तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध बिना भेदभाव कार्रवाई हो।
आखिरकार, न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी इसलिए बंधी है कि वह किसी का चेहरा, पद, पैसा और प्रभाव देखकर फैसला न करे। लेकिन यह पट्टी इतनी भी मोटी नहीं होनी चाहिए कि उसे अपनी तराजू के ठीक नीचे हो रही लूट दिखाई ही न दे। न्याय अगर सेवा है तो यह सेवा अब बहुत महंगी दरों पर बिक रही है और इसकी ब्लैक मार्केटिंग भी खुलेआम और धड़ल्ले से हो रही है। न्यायालयों में एक पेशी में उपस्थित होने के लिए 10-10 लाख या 20-20 लाख रुपये मुवक्किलों से वसूलने वाले वकील आखिर क्या हैं और न्यायिक व्यवस्था में आखिर क्यों हैं? कुछ चर्चित मामलों में इतनी भारी फीस लिए जाने के दावे सामने आते रहे हैं। आखिर ऐसी फीस और कानूनी सेवा के बीच पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत क्यों नहीं है?
न्याय का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब देश का सबसे गरीब नागरिक भी बिना बिके, बिना झुके और बिना पीढ़ियां गंवाए, सीना ताने आए और लगे हाथ न्याय प्राप्त कर सके। अन्यथा विधिक सेवा दिवस भी अनेक दूसरे दिवसों की तरह कैलेंडर की एक और तारीख बनकर रह जाएगा।





