Acn18. Com.नई दिल्ली/ कोंडागांव छग, बस्तर की माटी से निकली जिस कलम ने किसानों की समस्याओं, खेती-किसानी की चुनौतियों, पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी समाज के सवालों को लगातार राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का प्रयास किया है, उसे अब राजधानी दिल्ली में सम्मानित किया जाएगा। वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार और प्रयोगधर्मी कृषक डॉ. राजाराम त्रिपाठी को वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित ‘शिल्पी चड्ढा स्मृति श्रेष्ठश्री पत्रकार सम्मान’ के लिए चुना गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ सामाजिक योगदान के लिए दिया जाने वाला यह सम्मान उनके दीर्घकालीन लेखन और सामाजिक सरोकारों की मान्यता के रूप में देखा जा रहा है। सम्मान समारोह 12 दिसंबर 2026 को दिल्ली के हिंदी भवन में आयोजित किया जाएगा। सम्मान के साथ नकद राशि भी प्रदान की जाएगी।
प्रतिष्ठित ‘शिल्पी चड्ढा स्मृति सम्मान’ की स्थापना हरियाणा गौरव और प्रख्यात साहित्यकार डॉ. सविता चड्ढा ने की है। इस सम्मान के तहत साहित्य, पत्रकारिता, बाल साहित्य और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली प्रतिभाओं का निष्पक्ष निर्णायक मंडल द्वारा चयन कर उन्हें सम्मानित किया जाता है। वर्ष 2026 के लिए विभिन्न श्रेणियों में चयनित रचनाकारों के नामों की घोषणा कर दी गई है।
डॉ. राजाराम त्रिपाठी का चयन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनका लेखन केवल समाचारों और घटनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसान जीवन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जनजातीय अस्मिता, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक न्याय जैसे व्यापक विषयों से जुड़ा रहा है। बस्तर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र की जमीनी वास्तविकताओं को देश के व्यापक पाठक समुदाय तक पहुंचाना उनकी पत्रकारिता की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है।
बस्तर से शुरू हुई पत्रकारिता की यात्रा :
डॉ. त्रिपाठी का जन्म बस्तर के दरभा विकासखंड के ग्राम ककनार में हुआ। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा भी इसी क्षेत्र में हुई। उन्होंने बीएससी के बाद हिंदी और अंग्रेजी साहित्य सहित छह विषयों में स्नातकोत्तर उपाधियां प्राप्त कीं। इसके अलावा उन्होंने एलएल.बी. और पीएच.डी. की उपाधियां भी अर्जित कीं। साहित्य, समाज, कृषि और ग्रामीण जीवन के विभिन्न पहलुओं का उनका अध्ययन उनके लेखन को बहुआयामी दृष्टि देता है।
वर्ष 1982 में उन्होंने कुछ साथियों के साथ बस्तर से साप्ताहिक समाचार-पत्र ‘बस्तर टुडे’ का प्रकाशन शुरू किया। इस पहल ने उनके पत्रकारिता जीवन की नींव रखी। इसके बाद उन्होंने विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के संपादन में योगदान दिया। पिछले 12 वर्षों से वे दिल्ली से प्रकाशित जनजातीय सरोकारों की मासिक पत्रिका ‘ककसाड़’ का संपादन कर रहे हैं।
पिछले दो दशकों में उनके लेख ‘द पायनियर’, ‘राजस्थान पत्रिका’, ‘हरिभूमि’, ‘रविवार’ और ‘देशबंधु’ सहित अनेक समाचार-पत्रों में प्रकाशित होते रहे हैं। उनके लेखन में ग्रामीण भारत की चुनौतियों, किसानों की आर्थिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े प्रश्न प्रमुखता से सामने आते हैं। उन्होंने बस्तर में नक्सलवाद की समस्या को बचपन, किशोरावस्था, युवावस्था और प्रौढ़ावस्था तक करीब से देखा है। इस विषय के सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक कारणों के वे विशेषज्ञ अध्येता माने जाते हैं।
साहित्य में भी बस्तर की आवाज :
पत्रकारिता के साथ डॉ. त्रिपाठी की साहित्यिक यात्रा भी उल्लेखनीय रही है। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘पत्र यात्रा’, ‘मैं बस्तर बोल रहा हूँ’, ‘बस्तर बोलता भी है’ और ‘दुनिया इन दिनों’ शामिल हैं। उनका शोधग्रंथ ‘गांडा: अनुसूचित जाति या जनजाति’ भी उनकी वैचारिक और साहित्यिक प्रतिबद्धता का परिचायक है।
उनकी चर्चित पुस्तक ‘बस्तर बोलता भी है’ का मराठी अनुवाद ‘मी आदिवासी बोलतोय’ और अंग्रेजी अनुवाद ‘Yes, It Is Bastar Speaking’ प्रकाशित हो चुका है। उनकी रचनाओं में बस्तर की प्रकृति, लोकसंस्कृति, जनजातीय जीवन, संघर्ष, पीड़ा और स्वाभिमान को अभिव्यक्ति मिली है। वे क्षेत्रीय अनुभवों को व्यापक सामाजिक और राष्ट्रीय संदर्भों से जोड़ने का प्रयास करते रहे हैं।
खेतों में प्रयोग, कलम से किसान के सवाल:-
डॉ. त्रिपाठी की पहचान केवल पत्रकार और साहित्यकार के रूप में नहीं है। वे जैविक खेती, कृषि नवाचार और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। उनका मानना है कि खेती को केवल उत्पादन और बाजार के आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। इसके साथ किसान की आजीविका, मिट्टी की सेहत, जल संरक्षण, जैव विविधता और ग्रामीण समुदायों के भविष्य को भी केंद्र में रखना जरूरी है।
बस्तर में कृषि और ग्रामीण जीवन से उनका प्रत्यक्ष जुड़ाव उनके लेखन को जमीनी अनुभव देता है। वे खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों को नीतिगत बहसों तक पहुंचाने के साथ-साथ आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ उनके संबंधों को भी महत्व देते रहे हैं। उनके व्यक्तित्व में पत्रकारिता, साहित्य और कृषि-कर्म का यह संगम उन्हें विशिष्ट पहचान देता है।
साहित्य और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी अन्य प्रतिभाएं भी होंगी सम्मानित :
वर्ष 2026 के शिल्पी चड्ढा स्मृति सम्मान के तहत विभिन्न श्रेणियों में अन्य प्रतिभाओं का भी चयन किया गया है। मुख्य शिल्पी चड्ढा स्मृति सम्मान के लिए नाजरीन अंसारी की पुस्तक ‘लौट आओ मां’ चुनी गई है। यह सम्मान संबंधों पर आधारित प्रकाशित पुस्तकों के लिए दिया जाता है। ‘हीरों में हीरा सम्मान’ के लिए डॉ. सौरभ पांडेय और ‘गीतकारश्री सम्मान’ के लिए डॉ. विनयशील चतुर्वेदी का चयन किया गया है। बाल साहित्य की श्रेणी में ‘शिल्पी प्रनिका प्रथम बाल सम्मान’ के लिए बाल लेखिका प्रनिका क्वात्रा की पुस्तक ‘तितली के पर’ चुनी गई है।
सम्मान के लिए प्रतिभाओं के चयन का निर्णय लेने वाले निर्णायक मंडल में पंजाब नेशनल बैंक की सेवानिवृत्त सहायक महाप्रबंधक मनीषा शर्मा, साहित्यकार सूक्ष्म लता महाजन और हिंदी-उर्दू संगम के संस्थापक सैयद अली अख्तर नकवी आदि शामिल रहे। आयोजन के संयोजन में समाजसेवी इंद्रजीत शर्मा और डॉ. कल्पना पांडेय का विशेष योगदान है।
डॉ. सविता चड्ढा के अनुसार, इस वर्ष सम्मान के लिए अनेक उत्कृष्ट प्रविष्टियां प्राप्त हुईं और अंतिम चयन निर्णायक मंडल ने किया। चयनित रचनाकारों को सम्मानित करना संस्था के लिए गौरव का विषय है।
12 दिसंबर को दिल्ली के हिंदी-भवन में संपन्न होने वाला यह विशिष्ट समारोह साहित्य, पत्रकारिता और बाल साहित्य की प्रतिभाओं के योगदान को रेखांकित करेगा। डॉ. राजाराम त्रिपाठी का चयन यह भी दर्शाता है कि देश के दूरस्थ आदिवासी अंचलों से उठने वाली आवाजें, जब निरंतरता और सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ राष्ट्रीय मुद्दों को अभिव्यक्ति देती हैं, तो उनका प्रभाव भौगोलिक सीमाओं से आगे तक पहुंच सकता है।




