
15 दिन का अल्टीमेटम, मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन की चेतावनी
कोरबा। देश की बड़ी ऊर्जा परियोजनाओं में शामिल 2×660 मेगावाट सुपरक्रिटिकल थर्मल पावर प्रोजेक्ट में स्थानीय लोगों को रोजगार और बुनियादी सुविधाओं का लाभ नहीं मिलने का मुद्दा अब तूल पकड़ता दिखाई दे रहा है। कोरबा ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के महामंत्री अंकित वर्मा ने BHEL के साइट कार्यालय को ज्ञापन सौंपकर परियोजना में स्थानीय युवाओं और श्रमिकों के हितों की अनदेखी पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
ज्ञापन में कहा गया है कि जिस कोरबा की जमीन, संसाधन और पर्यावरण इस परियोजना का बोझ उठा रहे हैं, उसी क्षेत्र के शिक्षित और बेरोजगार युवाओं को रोजगार के लिए बाहर से आने वाले लोगों के सामने पीछे नहीं किया जाना चाहिए। स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देना महज मांग नहीं, बल्कि क्षेत्र के प्रति परियोजना की सामाजिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
ज्ञापन लेने को लेकर हुआ विवाद, रफा दफा करने की कोशिश
वहीं ज्ञापन लेने को लेकर प्रोजेक्ट मेनेजर और महामंत्री अंकित वर्मा के बीच तीखी नोकझोंक हुई। प्रोजेक्ट मेनेजर द्वारा पहले तो ज्ञापन लेने से इनकार किया गया। बहस और विवाद की स्थिति निर्मित होते देख अंततः ज्ञापन लिया गया परन्तु ज्ञापन की पावती नही प्रदान की गई। वर्मा द्वारा इसका विरोध किये जाने पर प्रोजेक्ट मेनेजर द्वारा पावती कलेक्टर कार्यालय से ले लेने कहा गया। इतना ही नहीं प्रोजेक्ट मेनेजर द्वारा पावती देने हेतु शर्त रखी गई की पावती तभी मिलेगी जब आप यह लिख कर दो की ज्ञापन से संबंधित सभी मुद्दों का निराकरण हो गया है। महामंत्री वर्मा द्वारा इसका विरोध करते हुए कोई भी लिखित आश्वासन देने से इनकार कर दिया गया।
1320 MW की परियोजना, लेकिन स्थानीय बेरोजगारी क्यों?
ज्ञापन में सबसे प्रमुख मुद्दा स्थानीय रोजगार का है। कांग्रेस कमेटी ने मांग की है कि परियोजना में स्थानीय शिक्षित एवं अशिक्षित युवाओं को अनिवार्य रूप से प्राथमिकता दी जाए और बाहर से लोगों को लाने के बजाय स्थानीय बेरोजगारों को काम दिया जाए। सवाल सीधा है—अगर रोजगार का इतना बड़ा अवसर कोरबा की धरती पर पैदा हो रहा है, तो कोरबा का युवा रोजगार के लिए भटकने को मजबूर क्यों हो?
श्रमिकों को पूरा न्यूनतम वेतन मिले
ज्ञापन में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के पूर्ण भुगतान की मांग भी की गई है। किसी भी श्रमिक का आर्थिक शोषण न हो और उसे उसके श्रम का निर्धारित पारिश्रमिक मिले, यह सुनिश्चित करने की मांग की गई है। इसके साथ ही श्रमिकों के लिए उचित स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग उठाई गई है।

प्लांट सुरक्षा पर भी सवाल
ज्ञापन में Plant Security Act के नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है, ताकि परियोजना में काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा से कोई समझौता न हो। इतनी बड़ी क्षमता वाली परियोजना में यदि सुरक्षा व्यवस्था में जरा भी लापरवाही होती है, तो उसका खामियाजा केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि पूरा क्षेत्र भुगत सकता है। इसलिए सुरक्षा को लागत या औपचारिकता नहीं, सर्वोच्च प्राथमिकता माना जाना चाहिए।

बाहर की गाड़ियों को तरजीह, स्थानीय वाहन मालिकों की अनदेखी
ज्ञापन में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा स्थानीय वाहन मालिकों का है। आरोप है कि प्लांट के काम में बाहर से लाई गई गाड़ियों को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे स्थानीय वाहन मालिकों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का सबसे आसान तरीका यही है कि परियोजना से जुड़े परिवहन एवं अन्य कार्यों में स्थानीय लोगों और स्थानीय संसाधनों को प्राथमिकता मिले।
बैचिंग प्लांट से उड़ती धूल, किसकी जिम्मेदारी ?
ज्ञापन का सबसे गंभीर पर्यावरणीय मुद्दा बैचिंग प्लांट से होने वाले धूल प्रदूषण को लेकर है। इसमें कहा गया है कि इससे स्थानीय पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि बैचिंग प्लांट की वैध अनुमति से संबंधित सवाल उठे हैं और नवंबर 2025 में विभिन्न समाचार पत्रों में इससे जुड़ी खबरें प्रकाशित होने का संदर्भ दिया गया है। कांग्रेस कमेटी ने मांग की है कि प्रबंधन तत्काल आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया पूरी करे तथा धूल प्रदूषण रोकने के लिए डस्ट सप्रेशन, स्प्रिंकलर जैसे उचित तकनीकी उपाय सुनिश्चित करे।
15 दिन का अल्टीमेटम
ज्ञापन में परियोजना प्रबंधन को 15 दिनों का समय दिया गया है। इसमें स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि स्थानीय युवाओं एवं श्रमिकों से जुड़ी मांगों का तत्काल निराकरण नहीं किया गया, श्रम नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं हुआ तथा बैचिंग प्लांट की अनुमति और प्रदूषण नियंत्रण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आंदोलन किया जाएगा।
यह राजनीति नहीं कोरबा के लोगों के हक की लड़ाई
एक तरफ 1320 मेगावाट की विशाल बिजली परियोजना, दूसरी तरफ स्थानीय युवा रोजगार की तलाश में भटकते रहें, स्थानीय वाहन मालिक काम के लिए तरसें, श्रमिक अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं और पर्यावरण को लेकर सवाल खड़े हों—तो फिर विकास का लाभ आखिर किसके लिए है?
अब निगाहें BHEL प्रबंधन और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों पर हैं। 15 दिन का अल्टीमेटम सिर्फ एक ज्ञापन नहीं, बल्कि स्थानीय हितों को लेकर उठी चेतावनी है। यदि मांगों पर समयबद्ध कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मुद्दा परियोजना की चारदीवारी से निकलकर सड़क और जनआंदोलन तक पहुंच सकता है।
कोरबा निवासियों का सवाल स्पष्ट है— “जिस धरती ने परियोजना को जगह दी, क्या उस धरती के युवाओं और लोगों को उनका हक मिलेगा?”








