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संयुक्त राष्ट्र संघ दिवस’ तथा 24 से 30 अक्टूबर तक ‘निशस्त्रीकरण सप्ताह’ के संदर्भ में विशेष लेख: *नाखून-दाँत विहीन शेर और विश्व शांति का स्वांग,”संयुक्त राष्ट्र की विफलता, हथियारों का कारोबार और नई वैश्विक व्यवस्था की अनिवार्यता,”

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Acn18. Com/डॉ. राजाराम त्रिपाठी राष्ट्रीय संयोजक अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) तथा स्वतंत्र स्तंभकार

मुख्य बिंदु :-
* वीटो व्यवस्था ने संयुक्त राष्ट्र की लोकतांत्रिक विश्वसनीयता और निर्णय क्षमता को कमजोर किया है।
* संयुक्त राष्ट्र को आज नाखून-दांत विहीन शेर कहना अतिश्योक्ति नहीं है, वहीं अमेरिका वैश्विक व्यवस्था में स्वयंभू दरोगा बन बैठा है।

* युद्ध की कीमत महाशक्तियां नहीं, बल्कि निर्दोष नागरिक, बच्चे, किसान और विस्थापित परिवार चुकाते हैं।
* भारत को समानता, न्याय और वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धांत पर नई वैश्विक व्यवस्था की पहल करनी चाहिए।
* विश्व शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र का लोकतंत्रीकरण, वीटो पर अंकुश और युद्ध अपराधों की जवाबदेही अनिवार्य है|

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  • 24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस है और इसी दिन से 30 अक्टूबर तक दुनिया निरस्त्रीकरण सप्ताह भी मनाती है। विडंबना देखिए कि जिस संस्था का जन्म युद्ध रोकने के लिए हुआ था, उसके स्थापना दिवस से ही दुनिया को हथियार छोड़ने की नसीहत देने वाला सप्ताह भी शुरू होता है। एक ओर शांति के उपदेश, दूसरी ओर नित नूतन हथियारों और बारूद की बढ़ती खपत। एक ओर मानवता के नाम पर घोषणाएं, दूसरी ओर मनुष्यों को मारने वाली मशीनों का बढ़ता अंतरराष्ट्रीय कारोबार। दुनिया के इस सबसे बड़े राजनीतिक रंगमंच पर शांति का अभिनय जितनी गंभीरता से होता है, युद्ध की तैयारी शायद उससे कई गुना ज्यादा गंभीरता से की जाती है।
    24 अक्टूबर 1945 को, द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद, संयुक्त राष्ट्र चार्टर प्रभावी हुआ। हिरोशिमा और नागासाकी की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी। करोड़ों मनुष्यों की हड्डियों पर खड़ी सभ्यता को पहली बार लगा कि राष्ट्रों के बीच विवादों के निपटारे के लिए किसी ऐसी वैश्विक पंचायत की जरूरत है, जहां ताकतवर की लाठी ही कानून न हो और छोटे देश की आवाज उसकी जनसंख्या, भूगोल या सैन्य क्षमता के कारण अनसुनी न कर दी जाए। उद्देश्य था आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाना, मानवाधिकारों की रक्षा करना, विकास को गति देना और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखना। शुरुआती वर्षों में दुनिया ने उम्मीद की एक नई खिड़की खुलते देखी थी।
    लेकिन आठ दशक बाद सवाल है कि उस खिड़की पर किसका कब्जा हो गया? क्या विश्व पंचायत अब ऐसी पंचायत नहीं बन गई है, जिसमें कुछ ताकतवर पंच स्वयं विवाद के पक्षकार भी हैं और फैसला सुनाने का विशेषाधिकार भी उन्हीं के पास है?
    आज संयुक्त राष्ट्र को नाखून-दांत विहीन शेर कहना अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा व्यवस्था पर उठता एक बुनियादी प्रश्न है। फर्क केवल इतना है कि जंगल का शेर कम-से-कम अपनी बेबसी पर दहाड़ तो सकता है, यहां तो कई बार दहाड़ भी कूटनीतिक भाषा में अनुवादित होकर फुस्स हो जाती है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों, अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस, को मिला वीटो अधिकार इस व्यवस्था की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमजोरी साबित हुई है। पंद्रह सदस्यीय सुरक्षा परिषद में चौदह सदस्य किसी प्रस्ताव के समर्थन में खड़े हो जाएं, तब भी एक स्थायी सदस्य का नकारात्मक मत उसे रोक सकता है। अर्थात लोकतंत्र का पाठ पूरी दुनिया को पढ़ाया जाएगा, लेकिन दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा संस्था में लोकतंत्र की परीक्षा पांच विशेषाधिकार प्राप्त देशों के विवेक या स्वार्थ पर छोड़ दी गई है।
    *गाजा इसका ताजा और कटु उदाहरण है। 4 जून 2025 को सुरक्षा परिषद के चौदह सदस्यों ने स्थायी युद्धविराम के प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन अमेरिका के वीटो ने उसे पारित नहीं होने दिया। यह किसी एक देश की कूटनीतिक जीत-हार का मामला भर नहीं था। यह उस व्यवस्था की परीक्षा थी, जिसमें करोड़ों लोगों की आशा और युद्धग्रस्त नागरिकों का भविष्य एक शक्तिशाली राष्ट्र के मत पर निर्भर हो सकता है। जब चौदह आवाजें एक ओर और एक आवाज दूसरी ओर हो, तब विश्व पंचायत में बहुमत का अर्थ क्या रह जाता है? संयुक्त राष्ट्र के अपने अभिलेख में दर्ज यह घटना उसकी निर्णय-प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।*
    इराक का प्रसंग तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इतिहास में चेतावनी की तरह दर्ज है। 2003 में सामूहिक विनाश के हथियारों का भय दिखाकर इराक पर आक्रमण किया गया। युद्ध से ठीक पहले संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों को इराक में ऐसे हथियार कार्यक्रमों के जारी रहने का प्रमाण नहीं मिला था, हालांकि कुछ पुराने हथियारों और अधूरे अभिलेखों से जुड़े प्रश्न अनसुलझे थे। 5 जून 2003 को निरीक्षण दल के प्रमुख हंस ब्लिक्स ने सुरक्षा परिषद को बताया कि निरीक्षकों के वापस बुलाए जाने तक प्रतिबंधित हथियार कार्यक्रमों के जारी रहने या फिर शुरू होने का प्रमाण नहीं मिला था। बाद की घटनाओं ने उस युद्ध के औचित्य और उसके लिए प्रस्तुत दावों पर गहरे प्रश्न खड़े कर दिए। *इराक का विनाश हुआ, सत्ता बदली, समाज टूटा, लेकिन जिस भयावह हथियार-भंडार को युद्ध का निर्णायक औचित्य बनाया गया था, उसका दावा उस रूप में सिद्ध नहीं हुआ।*
    अफगानिस्तान के दो दशकों के युद्ध, सीरिया का विध्वंस, यूक्रेन में जारी संघर्ष, गाजा की त्रासदी और ईरान के इर्द-गिर्द लगातार बना सैन्य तनाव एक ही सवाल को अलग-अलग रूपों में सामने रखते हैं। ताइवान के प्रश्न पर भी महाशक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा किसी संभावित संकट को वैश्विक संकट में बदलने की क्षमता रखती है। इन सभी घटनाओं के कारण और जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं, लेकिन एक समान चिंता है: अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं युद्ध रोकने और विवादों का न्यायपूर्ण समाधान निकालने में कितनी प्रभावी हैं? यदि विश्व की सबसे बड़ी संस्था युद्ध की आग बुझाने में निर्णायक नहीं बन सकती, तो उसकी नैतिक प्रतिष्ठा आखिर किस आधार पर कायम रहेगी?
    इस प्रश्न का सबसे भयावह पक्ष हथियारों का कारोबार है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट, यानी SIPRI, के अनुसार 2024 में दुनिया का सैन्य व्यय 2,718 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो वास्तविक मूल्य के आधार पर पिछले वर्ष से 9.4 प्रतिशत अधिक और अब तक का सर्वोच्च स्तर था। यह केवल रक्षा बजट नहीं, मानव सभ्यता की प्राथमिकताओं का लेखा-जोखा है। दुनिया ने एक वर्ष में हथियारों और सेनाओं पर जितनी रकम खर्च की, उसका एक अंश भी यदि भूख, प्राथमिक स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ पेयजल और जलवायु संकट से निपटने पर व्यवस्थित रूप से लगाया जाए, तो करोड़ों जीवन की दिशा बदल सकती है।
    हथियारों के अंतरराष्ट्रीय कारोबार के आंकड़े इस विडंबना को और स्पष्ट करते हैं। SIPRI की मार्च 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 2020 से 2024 के बीच अमेरिका की हिस्सेदारी वैश्विक प्रमुख हथियार निर्यात में 43 प्रतिशत थी। अर्थात दुनिया के सबसे बड़े हथियार निर्यातक की भूमिका निभाने वाला देश ही वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था में अत्यंत प्रभावशाली स्थान भी रखता है। जाहिर है ऐसे में पूरे विश्व का स्वयंभू दरोगा की हैसियत हासिल करना अमेरिका के हथियारों के व्यापार के लिए हर तरह से मुफीद है। यहां प्रश्न किसी एक देश को समूची हिंसा का दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि उस अंतरराष्ट्रीय आर्थिक ढांचे का है जिसमें हथियारों की मांग बढ़ने से उत्पादकों, आपूर्तिकर्ताओं और रणनीतिक गठबंधनों का महत्व बढ़ता जाता है। शांति की विफलता जिन उद्योगों के लिए बाजार का विस्तार बन जाए, वहां शांति के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति पैदा करना आसान नहीं होता।
    दुनिया का कोई भी देश अपनी सुरक्षा की उपेक्षा नहीं कर सकता। लेकिन नागरिकों को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि युद्ध का लाभ किसे मिलता है और उसकी कीमत कौन चुकाता है। मिसाइलों के सौदे सत्ता के गलियारों में होते हैं, पर उनका हिसाब बच्चे अपने टूटे विद्यालयों में, महिलाएं उजड़े घरों में, किसान जली हुई जमीनों पर और विस्थापित परिवार शरणार्थी शिविरों में चुकाते रहे हैं। निरस्त्रीकरण सप्ताह हमें इसी बुनियादी प्रश्न की ओर लौटने के लिए बाध्य करता है। संयुक्त राष्ट्र ने शांति स्थापना, मानवीय सहायता, स्वास्थ्य, शिक्षा, बाल कल्याण और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किया है। संयुक्त राष्ट्र की शांति स्थापना व्यवस्था के अंतर्गत 1948 से अब तक 125 देशों के बीस लाख से अधिक शांति सैनिक विभिन्न अभियानों में सेवा दे चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार उसकी पहल और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से 55 मिलियन से अधिक बारूदी सुरंगों के विनाश में भी योगदान हुआ है। *यूनिसेफ जैसे संगठनों ने संघर्ष और आपदाओं से प्रभावित बच्चों को स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और स्वच्छ जल उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से चेचक का उन्मूलन वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य की ऐतिहासिक उपलब्धि बना। यूनेस्को ने सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासतों के संरक्षण को अंतरराष्ट्रीय महत्व दिया। इन उपलब्धियों को नकारना अन्याय होगा।*
    लेकिन क्या इन मानवीय उपलब्धियों की आड़ में शांति और सुरक्षा के मोर्चे पर संस्थागत कमजोरी को अनदेखा किया जा सकता है? गरीबों को राहत देना और युद्ध रोकना दो अलग-अलग दायित्व हैं।
    आज की वैश्विक व्यवस्था में गजब का विरोधाभास है, एक ओर हथियारों की आपूर्ति, सैन्य गठबंधनों की प्रतिस्पर्धा और संसाधनों पर प्रभुत्व की राजनीति; दूसरी ओर मानवीय सहायता के नाम पर राहत। सेवा का मूल्य अपनी जगह है, लेकिन सेवा को उस अन्याय का विकल्प नहीं बनाया जा सकता जिसे रोकना सबसे बड़ा कर्तव्य है।
    अब समय केवल संयुक्त राष्ट्र की आलोचना करने का नहीं, उसे आमूलचूल बदलने और उससे आगे की समुचित वैकल्पिक व्यवस्था पर गंभीर विचार करने का है। क्या सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वीटो व्यवस्था में सुधार नहीं होना चाहिए? क्या किसी देश द्वारा वीटो लगाए जाने पर उस निर्णय का सार्वजनिक, अनिवार्य और समयबद्ध औचित्य प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए? क्या नरसंहार, आक्रामक युद्ध और बड़े पैमाने पर नागरिकों पर हमलों जैसी परिस्थितियों में वीटो के प्रयोग पर कड़े प्रतिबंध नहीं होने चाहिए? क्या महासभा को अधिक प्रभावी भूमिका, अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के निर्णयों को लागू करने के बेहतर साधन और युद्ध अपराधों के लिए निष्पक्ष जवाबदेही नहीं मिलनी चाहिए? इन प्रश्नों पर विचार किए बिना विश्व शांति के समारोह आयोजित करना केवल औपचारिकता पूरी करने के अलावा कुछ भी नहीं है।
    ऐसे हालातो मे बुद्ध महावीर तथा गांधी का देश भारत भारत ऐसी पहल करने का नैसर्गिक उत्तराधिकारी है। इतिहास गवाह है भारत में आज तक कभी किसी देश पर हमला नहीं किया है।
    भारत को इस बहस में केवल एक और महाशक्ति बनने की आकांक्षा से नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक नैतिक दृष्टि के साथ आगे आना चाहिए। हमारी सभ्यता ने हजारों वर्ष पहले कहा था:
    अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
    उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
    अर्थात यह अपना है और वह पराया, ऐसी गणना संकीर्ण बुद्धि वाले करते हैं; उदार चरित्र वाले लोगों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
    यह श्लोक किसी कमजोर देश को शक्तिशाली के सामने असहाय छोड़ देने का संदेश नहीं देता। परिवार में भी न्याय आवश्यक है। इसलिए भारत को ऐसी वैश्विक व्यवस्था के निर्माण की पहल करनी चाहिए जिसमें सभी राष्ट्रों की समान गरिमा हो, छोटे देशों की सुरक्षा,सम्प्रभुता सुनिश्चित हो, प्राकृतिक संसाधनों पर किसी एक शक्तिशाली राष्ट्र का मनमाना अधिकार न हो और आक्रामकता के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई के स्पष्ट, निष्पक्ष तथा कानूनी नियम हों।
    नई व्यवस्था बनाना आसान नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र को रातोंरात समाप्त कर देना भी समाधान नहीं है, क्योंकि उसकी अनेक उपलब्धियां और संस्थागत अनुभव मानवता की साझा संपत्ति हैं। आवश्यकता है उसके लोकतंत्रीकरण, जवाबदेही और प्रवर्तन क्षमता को मजबूत करने की, साथ ही ऐसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति बनाने की जो विशेषाधिकार के स्थान पर समानता और शक्ति के स्थान पर न्याय को प्रतिष्ठित करे। यदि मौजूदा ढांचा बार-बार अपने मूल दायित्वों में असफल होता है, तो उसके विकल्पों पर गंभीर विमर्श को रोकना भी अनुचित होगा।
    24 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र दिवस और 24 से 30 अक्टूबर तक निरस्त्रीकरण सप्ताह मनाते हुए दुनिया को समारोहों की दिखावटी औपचारिकता से आगे बढ़ना चाहिए। शांति केवल युद्ध न होने का नाम नहीं है। शांति वह व्यवस्था है जिसमें छोटे देश को बड़े देश से भयभीत न होना पड़े, बच्चों का बजट मिसाइलों की कीमत पर न कटे, प्राकृतिक संपदा किसी शक्तिशाली की लूट का पुरस्कार न बने और न्याय के दरवाजे पर वीटो का ताला न लटका हो।
    *आज दुनिया को केवल एक शेर की जरूरत नहीं, बल्कि ऐसे न्यायपूर्ण वैश्विक संविधान की जरूरत है जिसमें शेर भी कानून के अधीन हो और हिरण को अपनी रक्षा के लिए किसी शिकारी की कृपा पर निर्भर न रहना पड़े। संयुक्त राष्ट्र अपने जन्म के मूल उद्देश्य की ओर लौटकर यह भूमिका निभा सकता है, तभी इसका पुनर्जन्म संभव है। अन्यथा इतिहास उसे एक ऐसी महान आशा के रूप में याद करेगा, जिसे महाशक्तियों के विशेषाधिकारों ने धीरे-धीरे निष्प्राण कर दिया।
    विश्व शांति का अगला अध्याय अब केवल घोषणाओं से नहीं लिखा जाएगा। उसे लिखने के लिए साहस, समानता, जवाबदेही और न्याय की जरूरत होगी। और इस बार मानवता को यह सुनिश्चित करना होगा कि विश्व-पंचायत में किसी की आवाज केवल इसलिए न दबे कि उसके पास वीटो नहीं, बल्कि केवल इसलिए अनिवार्य रूप से सुनी जाए कि उसके पास भी संविधान प्रदत्त समानता तथा न्याय प्राप्त करने का वैध अधिकार है।
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