Home छत्तीसगढ़ एक ये भी गणेशोत्सव है, एक वो भी गणेशोत्सव था, जब गणेश...

एक ये भी गणेशोत्सव है, एक वो भी गणेशोत्सव था, जब गणेश उत्सव केवल उत्सव नहीं, पूरे गांव और शहर की धड़कन हुआ करता था, डॉ राजाराम, कृषि तथा ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ, राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)

0
10

कुछ खास बातें:-
#कभी गणेश उत्सव पूजा के साथ ही गांव की सामूहिक संस्कृति और कला का सबसे बड़ा मंच हुआ करता था।
#ककनार जैसे गांवों के स्कूलों से लेकर जगदलपुर जैसे कस्बों और रायपुर जैसी राजधानियों के मंचों तक गणेश उत्सव स्थानीय प्रतिभाओं का उत्सव था।
#लोकमान्य तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव को राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक एकजुटता का प्रभावी माध्यम बनाया।
#आज गणेश पंडालों की संख्या बढ़ी हैं, पर सामूहिकता और सांस्कृतिक आत्मीयता पीछे छूट गई है।
#छोटे शहरों मुहल्लों के युवा आज भी अपने श्रम और संसाधनों से इस परंपरा की लौ जलाए हुए हैं।

इन दिनों गणेश जी गणेश जी की बदाई चल रही है गणेश विसर्जन की धूम है। सामने गणेश जी को विदा करने जाते लगभग दर्जन भर युवाओं की टोली है और मन अचानक बचपन और कॉलेज के उन दिनों में लौट गया है। जब गणेश उत्सव केवल धार्मिक या आध्यात्मिक आयोजन नहीं हुआ करता था। वह हमारे गांव, हमारे शहर और हमारी सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का सबसे बड़ा उत्सव हुआ करता था।
हमारे वक्त में गणेश उत्सव प्रायः दस दिनों तक चलता था। पूरे शहर में जैसे रौनक उतर आती थी। हर बड़े चौक पर गणेश जी विराजते थे और हर पंडाल अपने आप में एक संसार होता था।
जब हम बच्चे थे, तब ककनार, छिंदबहार के प्राथमिक और मिडिल स्कूलों में भी गणेश उत्सव गांव का सबसे बड़ा उत्सव हुआ करता था। स्कूल उन दिनों केवल पढ़ाई की जगह नहीं रहता था, संस्कृति, भक्ति और सामूहिक आनंद का केंद्र बन जाता था।
अम्मा-चाची की धरोहर में रखी कोरी, जरीदार बनारसी साड़ियां तक गणेश जी के पंडाल और मंदिर की सजावट के लिए निकाल ली जाती थीं। हम तरह-तरह के रंगों की झंडिया,किए के रंग बिरंगे फूल बनाते, आटे की लेई से उन्हें चिपकाकर पूरे स्कूल को सजाते। गणेश जी की मूर्ति के सिर के पीछे जगदलपुर से लाया गया विशेष सतरंगी फूल लगाया जाता, जो खुलकर गोल चक्र की तरह उनके पीछे भगवान के असली आभामंडल की तरह विराजता था। बिजली नहीं थी, लेकिन दसों दिन दिन-रात गणेश जी के सामने दिया जलता था और रात में भी उसकी लौ बुझने न पाए, इसका ध्यान रखा जाता था।
सुबह-शाम ककड़ी, जिसमें उन दिनों लगभग हर घर की बाड़ी का स्वाद होता था, उसमें थोड़ा गुड़ मिलाकर प्रसाद बनता। श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए नारियल, अमरुद और गुड़ का प्रसाद भी बंटता। उस प्रसाद की मिठास आज भी स्मृतियों में जस की तस है।
रात में भतरी या उड़िया नाट होते। रामायण, महाभारत, दशावतार, भक्त प्रह्लाद जैसे धार्मिक आख्यानों से लेकर लोकप्रचलित प्रेम कथाओं तक का नृत्य, अभिनय और संगीत के साथ मंचन होता। कई गांवों के लोग रातभर चलने वाले इन नाटकों देखने आते थे। जमीन पर बैठकर आराम से इन नाटकों को देखते देखते दर्शक स्वयं भी कब उस नाटक का पात्र बन जाता था उसे उसे एहसास तक नहीं होता था। अब मनोरंजन बाजार से खरीदी हुई वस्तु नहीं था, वह गांव की अपनी सामूहिक रचना था।
फिर आखीर में आता गणेश विसर्जन।
पूरा गांव गणेश जी के साथ तालाब तक जाता। गणेश जी डोली में विराजते, कंधों पर लेकर भक्त चलते, ढोल, मंजीरे और नगाड़े बजते। गुरुजी और गांव के वरिष्ठजन भजन गाते आगे आगे और हम बच्चे नारे लगाने तथा घंटा-घड़ियाल बजाने में लगे रहते। दो-तीन किलोमीटर तक आवाज जाती और पूरे गांव को पता चल जाता कि गणेश जी विदा हो रहे हैं।
विसर्जन से पहले हवन होता, पंजीरी प्रसाद बनता। फिर वह क्षण आता, जब गणेश जी को तालाब में विदा करना होता। शायद ही कोई आंख ऐसी होती, जिसमें आंसू न हों।
इसके बाद तालाब में नारियल फेंका जाता और हम बच्चों की तैराकी की परीक्षा शुरू होती। जो सबसे पहले नारियल पकड़ता, वह उसका हो जाता। हालांकि बाद में मित्रों के साथ मिल-बांटकर बैठकर खा लेते। उस नारियल में जीत से ज्यादा दोस्ती का स्वाद होता था।
लौटते समय मन में अजीब खालीपन उतर आता। सूना पड़ा गणेश पंडाल देखकर आंखें भर आतीं। जहां कुछ घंटे पहले रोशनी, फूल, भजन और भीड़ थी, वहां अब खाली जगह थी। पूरा गांव दो-तीन दिनों तक खाली-खाली लगता।
अब यह सब केवल स्मृतियां हैं।
फिर कॉलेज के दिन आए और गणेश उत्सव का सांस्कृतिक संसार और व्यापक हो गया। चंदैनी गोंदा, सोनहा बिहान और कारी जैसे छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य हमारी सांस्कृतिक दुनिया के बड़े नाम थे। ये वास्तव में छत्तीसगढ़ की लोकनाट्य परंपरा के महत्वपूर्ण रूप हैं।
गणेश उत्सव के मंच स्थानीय कलाकारों के लिए बड़े अवसर होते। लोकगायक, नाटक, कवि सम्मेलन, कव्वालियों के जंगी मुकाबले और आर्केस्ट्रा, सबका अपना आकर्षण था। जगदलपुर में नागपुर के मेलोडी मेकर्स की धूम रहती और रायपुर के झंकार जैसे आर्केस्ट्रा कार्यक्रमों के लिए दूर-दूर से लोग आते। उस दौर के जगदलपुर के साथियों को आज भी वे रातें याद होंगी।
जगदलपुर में एक से एक धुरंधर गायक और म्यूजिशियन हुए। मंच का एंकर भी किसी सितारे से कम नहीं होता था। उसके कपड़े, अंदाज, आवाज और मंच पर उसका आत्मविश्वास हम दर्शकों को सम्मोहित करता था।
बड़े समितियों के दस दिनों में प्रायः एक दिन बड़े बाहर के कलाकारों के लिए होता, बाकी नौ दिन स्थानीय कलाकारों और स्थानीय आर्केस्ट्रा के नाम। गणेश महोत्सव स्थानीय प्रतिभा को मंच पर उतारने का सबसे बड़ा अवसर था।
फिर मंच बदलने लगे। मिथुन चक्रवर्ती की डिस्को डांसर के दौर के बाद नृत्य प्रतियोगिताएं बढ़ीं। पता ही नहीं चला कि कब रिकॉर्डिंग डांस और फूहड़ प्रस्तुतियों ने जगह ले ली। वह दौर भी चला गया। आज भी कुछ संस्थाएं सा रे गा मा जैसी सुरुचिपूर्ण संगीत प्रतियोगिताएं कराती हैं, लेकिन अब वहां भी कई बार म्यूजिशियन से अधिक कैरीओके तकनीक दिखाई देती है। म्यूजिशियन गायब हैं, टेक्नीशियन की धूम है।
और आज सांस्कृतिक कार्यक्रम हमारी मुट्ठी में कैद मोबाइल में हैं।
मोबाइल की रील से अगर फुर्सत मिले तो कभी रियल लाइफ की ओर भी झांककर देखें।
गणेश उत्सव की इस यात्रा को समझने के लिए उसका इतिहास भी याद रखना चाहिए। गणेश की पूजा सदियों पुरानी है, लेकिन आधुनिक सार्वजनिक गणेशोत्सव का रूप उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में महाराष्ट्र में उभरा। पुणे में 1892 में भाऊसाहेब रंगारी और अन्य लोगों की सार्वजनिक पहल के प्रमाण मिलते हैं। 1893 से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे बड़े पैमाने पर संगठित कर राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक संवाद का मंच बनाया।
यानी तिलक ने गणेश जी को केवल घर की चौखट से बाहर नहीं निकाला, उन्होंने उत्सव को समाज और राष्ट्र से जोड़ दिया। सार्वजनिक गणेशोत्सव में चर्चा, संगीत, नाटक और लोककलाओं को जगह मिली और यह स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में जन-जागरण का माध्यम बना।
आज विडंबना देखिए। देश को जोड़ने के लिए कभी गणेश जी को सार्वजनिक मंच बनाया गया था, आज उन्हीं सार्वजनिक मंचों की सामूहिकता कई जगह सिकुड़ रही है।
गणेश जी के लिए चंदा मांगने जाइए तो जवाब मिलता है, “भैया, हम भी अपने घर में गणेश रखे हुए हैं।”
पहले गणेश जी पूरे गांव के होते थे, फिर मोहल्ले के हुए और अब धीरे-धीरे घरों तक सिमटते जा रहे हैं। पहले दो वक्त आरती होती थी, अब कई जगह एक वक्त की आरती से ही गणेश जी को संतोष करना पड़ता है।
बस्तर के कुछ अंदरूनी इलाकों में गणेश या दुर्गा उत्सव के विरोध की बातें सुनाई देना भी चिंता का विषय है। किसी भी समुदाय को उसकी आस्था और संस्कृति से काटकर मजबूत नहीं बनाया जा सकता। कौन लोग यह कर रहे हैं, उनके उद्देश्य क्या हैं, इसके बारे में बिना प्रमाण किसी विदेशी शक्ति या किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि जो ताकतें समाज को छोटे-छोटे खांचों में बांटती हैं, वे अंततः पूरे समाज को कमजोर करती हैं, जाहिर है कि इससे देश भी कमजोर होता है।।
बस्तर का आदिवासी समाज सरल और आत्मीय है। उसके बीच से ही यदि कोई उसकी सदियों की सामाजिक-सांस्कृतिक एकता को कमजोर करने लगे तो यह विशेष चिंता का विषय है। कुल्हाड़ी लकड़ी काटती है, लेकिन उसके लिए बेंट भी लकड़ी की ही चाहिए।
इसलिए आज जरूरत किसी के धर्म को दूसरे पर थोपने की नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक सामूहिकता को बचाने की है जिसमें गांव का बच्चा, बुजुर्ग, कलाकार, किसान और पड़ोसी एक साथ खड़े होते थे।
और इसी संदर्भ में कोंडागांव की गणेश समितियां विशेष बधाई की पात्र हैं। जब रायपुर और जगदलपुर जैसे शहरों में गणेश उत्सव काफी हद तक अंतिम दिवस की झांकी तक सिमटता दिखाई देता है, तब कोंडागांव तथा ऐसे ही छोटे शहरों के युवा अपने श्रम, संसाधनों और सामूहिक समर्पण से इस परंपरा की लौ जलाए हुए हैं। इन सभी मेहनती और समर्पित युवाओं को मेरा हार्दिक अभिनंदन और साधुवाद।
गणेश जी हमें कभी घर के किसी सदस्य की तरह लगते थे। साल में एक बार आते थे, कुछ दिनों के लिए रहते थे और जाते समय घर, मोहल्ला और पूरा गांव खाली कर जाते थे।
आज हमारे पास अधिक साधन हैं, अधिक रोशनी है, अधिक तकनीक है, अधिक मनोरंजन है, लेकिन वह सामूहिकता कहीं पीछे छूटती जा रही है।
कभी गणेश जी के जाने के बाद गांव सूना लगता था। आज कई जगह गणेश जी के आने के बाद भी पंडाल सूना दिखाई देता है। पर अब उधर देखते हो किसी को फुर्सत नहीं है सब जाने कहां दौड़े चले जा रहे हैं। पंडाल तो सूने हुए ही, लोगों के दिल संवेदनशीलता से सूने हो चले हैं।
यही फर्क हमें सोचने पर मजबूर करता है।
परंपरा का वृक्ष अभी पूरी तरह सूखा नहीं है। उसकी जड़ें हमारी स्मृतियों में, हमारे लोकगीतों में, हमारे कलाकारों में, हमारे गांवों में और नई पीढ़ी के कुछ संवेदनशील युवाओं में अभी जीवित हैं।
जरूरत केवल इतनी है कि उन जड़ों को पानी दिया जाए।
गणेश जी केवल विघ्नहर्ता बनकर हमारे घरों में न आएं, वे हमारी सामूहिक संस्कृति, हमारी लोककलाओं, हमारी स्मृतियों और हमारी संवेदनाओं को भी फिर से जोड़ें।
क्योंकि जिस दिन गणेश उत्सव केवल मूर्ति, आरती और विसर्जन तक सीमित हो जाएगा और उसकी सांस्कृतिक आत्मा खो जाएगी, उस दिन उत्सव तो रहेगा, लेकिन उत्सव का अर्थ खो जाएगा।
गणपति बप्पा मोरया।
हमारी वह सांस्कृतिक आत्मा, सामूहिकता , संवेदनशीलता फिर लौटे, लौटते गणेश से मन यही मांग रहा है।

error: Content is protected !!