बिलासपुर। CBI को देश की सबसे बड़ी ऊर्जा उत्पादक कंपनी NTPC के कोरबा सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट से जुड़े 42 साल पुराने बहुचर्चित मामले में तगड़ा कानूनी झटका लगा है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मेसर्स अटलांटिक इंजीनियरिंग सर्विसेज प्रा. लि. के दो पूर्व निदेशकों एस.एस. संधू और डी.एस. संधू को बरी करने के निचली अदालत के फैसले पर अंतिम मुहर लगा दी है।
जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने साफ कहा – _”जांच एजेंसी आपराधिक षड्यंत्र और धोखाधड़ी के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही।”_
1981 के ठेके से शुरू हुआ था खेल, फर्जी बिलों का आरोप
CBI की FIR के मुताबिक, कहानी 1981 की है। कंपनी को NTPC कोरबा के तीसरे चरण में वेंटिलेशन सिस्टम और AC प्लांट की सप्लाई का ठेका मिला था। आरोप था कि जनवरी से नवंबर 1982 के बीच कंपनी के निदेशकों ने NTPC के कुछ अफसरों के साथ मिलकर साजिश रची और बिना सामान सप्लाई किए फर्जी बिलों-वाउचरों पर करीब 20 लाख रुपये का भुगतान ले लिया। गंभीरता देख CBI ने 1986 में केस दर्ज किया।
32 साल बाद सजा, फिर पलटा फैसला – 3 आरोपियों की मौत
मामला दशकों तक खिंचा। 10 जनवरी 2018 को रायपुर की विशेष CBI कोर्ट ने 32 साल बाद दोनों को दोषी करार देकर सजा सुना दी। लेकिन आरोपियों ने तुरंत अपील की। 13 सितंबर 2019 को रायपुर के विशेष न्यायाधीश (CBI) ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए दोनों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसी बरी करने के आदेश के खिलाफ CBI हाईकोर्ट पहुंची थी। इस लंबी लड़ाई के बीच 3 अन्य आरोपियों की मौत भी हो चुकी है।
बचाव पक्ष का ब्रह्मास्त्र – सामान तो सप्लाई हुआ, हिसाब तो हो गया था
बचाव पक्ष ने कोर्ट में दांव खेला – “कथित फर्जी भुगतान भ्रामक है। जिन विसंगतियों की बात CBI कर रही है, उनका समाधान NTPC अफसरों के साथ बैठकों में ही हो गया था। अधिक ली गई राशि वापस कर दी गई या अंतिम बिलों में एडजस्ट कर ली गई। अनुबंध का सामान भी बाद में पूरा सप्लाई कर दिया गया।”
हाई कोर्ट ने कहा-साजिश का कोई पुख्ता सबूत नहीं
जस्टिस अग्रवाल ने अपने फैसले में कानूनी नजीर दी – “आपराधिक साजिश साबित करने के लिए आरोपियों के बीच गैर-कानूनी मंशा का विश्वसनीय सबूत जरूरी है। CBI कोई प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश करने में विफल रही। लेटर ऑफ क्रेडिट की समय सीमा बढ़ाना, खातों का मिलान, राशि का समायोजन और बाद में पूरी सप्लाई – ये सभी तथ्य आरोपियों को Benefit of Doubt देने के लिए काफी हैं।”
कोर्ट ने कहा – अपीलीय अदालत के फैसले में हस्तक्षेप का कोई विधिक आधार नहीं, इसलिए CBI की अपील खारिज की जाती है। दोनों पूर्व निदेशकों की रिहाई बरकरार रहेगी।





