विशेष लेख : *महिला आरक्षण की ओट में परिसीमन: लोकतंत्र की पुनर्रचना या सत्ता का पुनर्संतुलन?*
विशेष लेख : *महिला आरक्षण की ओट में परिसीमन: लोकतंत्र की पुनर्रचना या सत्ता का पुनर्संतुलन?*
लेखक: डॉ राजाराम त्रिपाठी सामाजिक चिंतक तथा अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक,
मुख्य बिंदु (बॉक्स हेतु) :-
*महिला आरक्षण के कंधे पर चढ़ाकर परिसीमन को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई।*
*परिसीमन से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संतुलन बदल सकता है।*
*बिना पर्याप्त चर्चा के संवैधानिक बदलाव लोकतंत्र को कमजोर करते हैं।*
*यह मुद्दा सत्ता बनाम विपक्ष नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों का है।*
भारत में 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का संतुलन दशकों से स्थिर रखा गया था, जिसे 2026 तक फ्रीज किया गया। प्रस्तावित परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर लगभग 750 से 850 तक पहुंच सकती हैं। जनसंख्या आधारित पुनर्वितरण से उत्तर भारत को अधिक प्रतिनिधित्व मिलने और दक्षिण भारत की हिस्सेदारी घटने की आशंका है। महिला आरक्षण को नई जनगणना और परिसीमन से जोड़ना सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में हालिया बदलावों ने निष्पक्षता को लेकर प्रश्न खड़े किए हैं। इन सबके बीच बिना व्यापक बहस और सहमति के विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल उठाता है।
“महिला आरक्षण बिल के कंधे पर चढ़कर परिसीमन बिल संसद की वैतरणी पार करने चला था।” यह कथन आज के राजनीतिक घटनाक्रम को केवल व्यंग्यात्मक भाषा में नहीं, बल्कि उसके गूढ़ यथार्थ के साथ सामने रखता है। जब यह प्रयास सफल नहीं हुआ, तब यह प्रचारित किया जाने लगा कि विपक्ष ने महिलाओं को बराबरी दिलाने के नेक कार्य में बाधा उत्पन्न की। किंतु इस पूरे घटनाक्रम को यदि गहराई से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह केवल महिला सशक्तिकरण का प्रश्न नहीं था, बल्कि एक जटिल राजनीतिक संरचना को सरल भावनात्मक मुद्दे के आवरण में प्रस्तुत करने का प्रयास था, जिसमें देश की जनता को कमतर समझने का भाव भी कहीं न कहीं परिलक्षित होता है।
भारत में परिसीमन की प्रक्रिया का अपना एक दीर्घ इतिहास रहा है। स्वतंत्रता के बाद 1952, 1963 और 1973 में परिसीमन आयोगों का गठन हुआ और जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया गया। किंतु 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया, जिसके अंतर्गत लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्विन्यास को वर्ष 2001 तक स्थगित कर दिया गया। इसका मूल उद्देश्य यह था कि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल हो रहे हैं, उन्हें इस सफलता के कारण राजनीतिक रूप से नुकसान न उठाना पड़े। बाद में 2001 में 84वें संविधान संशोधन के माध्यम से इस स्थगन को 2026 तक बढ़ा दिया गया। हालांकि 2002 से 2008 के बीच परिसीमन आयोग ने सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया, लेकिन सीटों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। यह संतुलन भारत के संघीय ढांचे को बनाए रखने की एक सोच-समझी रणनीति थी।
दूसरी ओर, महिला आरक्षण का प्रश्न भी कोई नया नहीं है। 1996 में पहली बार इसे संसद में प्रस्तुत किया गया, 2008 में राज्यसभा से पारित हुआ, 2010 में इस पर व्यापक चर्चा हुई, किंतु सहमति के अभाव में यह बार-बार अटकता रहा। अंततः 2023 में “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के रूप में इसे पारित किया गया। लेकिन इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद शर्त यह रही कि इसके क्रियान्वयन को अगली जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ दिया गया। अर्थात् जब तक नई जनगणना नहीं होगी और उसके आधार पर परिसीमन नहीं होगा, तब तक महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकेगा। यहीं से विवाद की असली जड़ प्रारंभ होती है।
भारत की वर्तमान जनसंख्या लगभग 142 करोड़ के आसपास आंकी जाती है। उत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश जिसकी जनसंख्या लगभग 24 करोड़ है, और बिहार जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है। इसके विपरीत तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है और उनकी जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है। यदि परिसीमन पूरी तरह वर्तमान जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो यह स्वाभाविक है कि उत्तर भारत की लोकसभा सीटों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जबकि दक्षिण भारत की हिस्सेदारी सापेक्ष रूप से घट जाएगी। अनुमान व्यक्त किए जा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 या उससे अधिक हो सकती हैं। इस प्रकार का परिवर्तन न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करेगा, बल्कि नीति निर्माण की दिशा भी बदल सकता है।
इसी संदर्भ में लोकसभा के संभावित विस्तार का प्रश्न भी उठता है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें हैं, किंतु परिसीमन के बाद इसके 800 या उससे अधिक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इतने बड़े सदन में प्रभावी बहस, निर्णय प्रक्रिया और क्षेत्रीय मुद्दों की समुचित अभिव्यक्ति एक गंभीर चुनौती बन सकती है। यह केवल संख्या का विस्तार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक गुणवत्ता का भी प्रश्न है।
सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि महिला आरक्षण जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और सर्वस्वीकृत मुद्दे को परिसीमन जैसे जटिल और विवादास्पद विषय से जोड़ दिया गया। यदि वास्तव में उद्देश्य महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना था, तो इसे स्वतंत्र रूप से लागू किया जा सकता था। सभी राजनीतिक दलों के साथ व्यापक संवाद स्थापित कर एक सर्वसम्मत वातावरण तैयार किया जा सकता था। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि एक सरल और भावनात्मक मुद्दे को एक जटिल राजनीतिक प्रक्रिया के साथ जोड़कर उसे पारित कराने का प्रयास किया गया, जिसे कई लोग “टेलर-मेड” दृष्टिकोण भी कह रहे हैं।
इस पूरे परिदृश्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। विशेषकर चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में हालिया परिवर्तनों ने उसकी निष्पक्षता को लेकर चिंताएं उत्पन्न की हैं। जब चयन प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका को सीमित किया जाता है और कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ता है, तो स्वाभाविक रूप से यह आशंका जन्म लेती है कि क्या चुनाव प्रक्रिया वास्तव में निष्पक्ष रह पाएगी। यदि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगता है, तो लोकतंत्र की पवित्रता स्वतः संदिग्ध हो जाती है।
जहां तक राजनीतिक दलों की भूमिका का प्रश्न है, तो यह भी एक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करता है। सत्तारूढ़ पक्ष ने इसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम के रूप में प्रस्तुत किया, किंतु इसे परिसीमन से जोड़ने के कारण उसकी मंशा पर प्रश्न उठे। वहीं विपक्ष ने प्रक्रिया और समय पर सवाल उठाए, किंतु यह भी सत्य है कि अतीत में वह स्वयं इस विषय पर निर्णायक कदम उठाने में असफल रहा है। अतः दोनों पक्षों का आकलन करते समय निष्पक्षता आवश्यक है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या इतने महत्वपूर्ण विधेयकों पर संसद में पर्याप्त चर्चा हुई। क्या तीन-चार दिनों का समर्पित समय देकर इस विषय के सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक और राजनीतिक आयामों पर व्यापक विचार किया गया। स्पष्टतः ऐसा नहीं हुआ। यही वह बिंदु है, जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आत्मा आहत होती है।
और अंततः, इस पूरे विमर्श के केंद्र में वह आम नागरिक है, जो लोकतंत्र का वास्तविक आधार है। वही नागरिक जो अपने मताधिकार के माध्यम से नेताओं को सत्ता तक पहुंचाता है, वही चुनाव के बाद व्यवस्था के सामने स्वयं को उपेक्षित पाता है। चुनाव के समय folded hands और विनम्रता से भरे नेता, चुनाव के बाद सायरन बजाते काफिलों में आम जनता को रास्ते से हटाते हुए निकलते हैं। जिस जनता के करों से उनकी सुरक्षा, उनके वाहन, उनकी सुविधाएं संचालित होती हैं, वही जनता उनके लिए अप्रासंगिक हो जाती है।
इसलिए कल संसद में जो हुआ, उसे केवल सत्ता पक्ष की हार या विपक्ष की जीत के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी। यह लोकतंत्र के भीतर बची हुई चेतना का संकेत है। यह उस आम आदमी की मौन उपस्थिति का प्रमाण है, जो हर पांच वर्ष में अपनी उंगली पर स्याही लगाकर यह याद दिलाता है कि सत्ता का वास्तविक स्रोत कौन है।
अब आवश्यकता इस बात की है कि नेताओं की आंखों पर चढ़ा वह अहंकार का चश्मा उतर जाए, जिससे उन्हें जनता केवल आंकड़ों का समूह या भीड़ के रूप में दिखाई देती है। लोकतंत्र तभी सशक्त होगा, जब सत्ता और जनता के बीच का यह मनोवैज्ञानिक अंतर समाप्त होगा और जनप्रतिनिधि वास्तव में “जन” का प्रतिनिधित्व करने लगेंगे।
लेखक: डॉ राजाराम त्रिपाठी सामाजिक चिंतक तथा अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक,
*महिला आरक्षण के कंधे पर चढ़ाकर परिसीमन को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई।*
*परिसीमन से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संतुलन बदल सकता है।*
*बिना पर्याप्त चर्चा के संवैधानिक बदलाव लोकतंत्र को कमजोर करते हैं।*
*यह मुद्दा सत्ता बनाम विपक्ष नहीं, बल्कि जनता के अधिकारों का है।*
भारत में 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का संतुलन दशकों से स्थिर रखा गया था, जिसे 2026 तक फ्रीज किया गया। प्रस्तावित परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर लगभग 750 से 850 तक पहुंच सकती हैं। जनसंख्या आधारित पुनर्वितरण से उत्तर भारत को अधिक प्रतिनिधित्व मिलने और दक्षिण भारत की हिस्सेदारी घटने की आशंका है। महिला आरक्षण को नई जनगणना और परिसीमन से जोड़ना सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में हालिया बदलावों ने निष्पक्षता को लेकर प्रश्न खड़े किए हैं। इन सबके बीच बिना व्यापक बहस और सहमति के विधायी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल उठाता है।
“महिला आरक्षण बिल के कंधे पर चढ़कर परिसीमन बिल संसद की वैतरणी पार करने चला था।” यह कथन आज के राजनीतिक घटनाक्रम को केवल व्यंग्यात्मक भाषा में नहीं, बल्कि उसके गूढ़ यथार्थ के साथ सामने रखता है। जब यह प्रयास सफल नहीं हुआ, तब यह प्रचारित किया जाने लगा कि विपक्ष ने महिलाओं को बराबरी दिलाने के नेक कार्य में बाधा उत्पन्न की। किंतु इस पूरे घटनाक्रम को यदि गहराई से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह केवल महिला सशक्तिकरण का प्रश्न नहीं था, बल्कि एक जटिल राजनीतिक संरचना को सरल भावनात्मक मुद्दे के आवरण में प्रस्तुत करने का प्रयास था, जिसमें देश की जनता को कमतर समझने का भाव भी कहीं न कहीं परिलक्षित होता है।
भारत में परिसीमन की प्रक्रिया का अपना एक दीर्घ इतिहास रहा है। स्वतंत्रता के बाद 1952, 1963 और 1973 में परिसीमन आयोगों का गठन हुआ और जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण किया गया। किंतु 1976 में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया, जिसके अंतर्गत लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्विन्यास को वर्ष 2001 तक स्थगित कर दिया गया। इसका मूल उद्देश्य यह था कि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल हो रहे हैं, उन्हें इस सफलता के कारण राजनीतिक रूप से नुकसान न उठाना पड़े। बाद में 2001 में 84वें संविधान संशोधन के माध्यम से इस स्थगन को 2026 तक बढ़ा दिया गया। हालांकि 2002 से 2008 के बीच परिसीमन आयोग ने सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया, लेकिन सीटों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं किया गया। यह संतुलन भारत के संघीय ढांचे को बनाए रखने की एक सोच-समझी रणनीति थी।
दूसरी ओर, महिला आरक्षण का प्रश्न भी कोई नया नहीं है। 1996 में पहली बार इसे संसद में प्रस्तुत किया गया, 2008 में राज्यसभा से पारित हुआ, 2010 में इस पर व्यापक चर्चा हुई, किंतु सहमति के अभाव में यह बार-बार अटकता रहा। अंततः 2023 में “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के रूप में इसे पारित किया गया। लेकिन इस अधिनियम की सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद शर्त यह रही कि इसके क्रियान्वयन को अगली जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ दिया गया। अर्थात् जब तक नई जनगणना नहीं होगी और उसके आधार पर परिसीमन नहीं होगा, तब तक महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकेगा। यहीं से विवाद की असली जड़ प्रारंभ होती है।
भारत की वर्तमान जनसंख्या लगभग 142 करोड़ के आसपास आंकी जाती है। उत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश जिसकी जनसंख्या लगभग 24 करोड़ है, और बिहार जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है। इसके विपरीत तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है और उनकी जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है। यदि परिसीमन पूरी तरह वर्तमान जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो यह स्वाभाविक है कि उत्तर भारत की लोकसभा सीटों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जबकि दक्षिण भारत की हिस्सेदारी सापेक्ष रूप से घट जाएगी। अनुमान व्यक्त किए जा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 या उससे अधिक हो सकती हैं। इस प्रकार का परिवर्तन न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित करेगा, बल्कि नीति निर्माण की दिशा भी बदल सकता है।
इसी संदर्भ में लोकसभा के संभावित विस्तार का प्रश्न भी उठता है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें हैं, किंतु परिसीमन के बाद इसके 800 या उससे अधिक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इतने बड़े सदन में प्रभावी बहस, निर्णय प्रक्रिया और क्षेत्रीय मुद्दों की समुचित अभिव्यक्ति एक गंभीर चुनौती बन सकती है। यह केवल संख्या का विस्तार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक गुणवत्ता का भी प्रश्न है।
सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि महिला आरक्षण जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और सर्वस्वीकृत मुद्दे को परिसीमन जैसे जटिल और विवादास्पद विषय से जोड़ दिया गया। यदि वास्तव में उद्देश्य महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना था, तो इसे स्वतंत्र रूप से लागू किया जा सकता था। सभी राजनीतिक दलों के साथ व्यापक संवाद स्थापित कर एक सर्वसम्मत वातावरण तैयार किया जा सकता था। किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि एक सरल और भावनात्मक मुद्दे को एक जटिल राजनीतिक प्रक्रिया के साथ जोड़कर उसे पारित कराने का प्रयास किया गया, जिसे कई लोग “टेलर-मेड” दृष्टिकोण भी कह रहे हैं।
इस पूरे परिदृश्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। विशेषकर चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में हालिया परिवर्तनों ने उसकी निष्पक्षता को लेकर चिंताएं उत्पन्न की हैं। जब चयन प्रक्रिया में न्यायपालिका की भूमिका को सीमित किया जाता है और कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ता है, तो स्वाभाविक रूप से यह आशंका जन्म लेती है कि क्या चुनाव प्रक्रिया वास्तव में निष्पक्ष रह पाएगी। यदि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगता है, तो लोकतंत्र की पवित्रता स्वतः संदिग्ध हो जाती है।
जहां तक राजनीतिक दलों की भूमिका का प्रश्न है, तो यह भी एक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करता है। सत्तारूढ़ पक्ष ने इसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कदम के रूप में प्रस्तुत किया, किंतु इसे परिसीमन से जोड़ने के कारण उसकी मंशा पर प्रश्न उठे। वहीं विपक्ष ने प्रक्रिया और समय पर सवाल उठाए, किंतु यह भी सत्य है कि अतीत में वह स्वयं इस विषय पर निर्णायक कदम उठाने में असफल रहा है। अतः दोनों पक्षों का आकलन करते समय निष्पक्षता आवश्यक है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि क्या इतने महत्वपूर्ण विधेयकों पर संसद में पर्याप्त चर्चा हुई। क्या तीन-चार दिनों का समर्पित समय देकर इस विषय के सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक और राजनीतिक आयामों पर व्यापक विचार किया गया। स्पष्टतः ऐसा नहीं हुआ। यही वह बिंदु है, जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आत्मा आहत होती है।
और अंततः, इस पूरे विमर्श के केंद्र में वह आम नागरिक है, जो लोकतंत्र का वास्तविक आधार है। वही नागरिक जो अपने मताधिकार के माध्यम से नेताओं को सत्ता तक पहुंचाता है, वही चुनाव के बाद व्यवस्था के सामने स्वयं को उपेक्षित पाता है। चुनाव के समय folded hands और विनम्रता से भरे नेता, चुनाव के बाद सायरन बजाते काफिलों में आम जनता को रास्ते से हटाते हुए निकलते हैं। जिस जनता के करों से उनकी सुरक्षा, उनके वाहन, उनकी सुविधाएं संचालित होती हैं, वही जनता उनके लिए अप्रासंगिक हो जाती है।
इसलिए कल संसद में जो हुआ, उसे केवल सत्ता पक्ष की हार या विपक्ष की जीत के रूप में देखना एक बड़ी भूल होगी। यह लोकतंत्र के भीतर बची हुई चेतना का संकेत है। यह उस आम आदमी की मौन उपस्थिति का प्रमाण है, जो हर पांच वर्ष में अपनी उंगली पर स्याही लगाकर यह याद दिलाता है कि सत्ता का वास्तविक स्रोत कौन है।
अब आवश्यकता इस बात की है कि नेताओं की आंखों पर चढ़ा वह अहंकार का चश्मा उतर जाए, जिससे उन्हें जनता केवल आंकड़ों का समूह या भीड़ के रूप में दिखाई देती है। लोकतंत्र तभी सशक्त होगा, जब सत्ता और जनता के बीच का यह मनोवैज्ञानिक अंतर समाप्त होगा और जनप्रतिनिधि वास्तव में “जन” का प्रतिनिधित्व करने लगेंगे।





