*”विश्व जल सप्ताह-2026 : 23 से 27 अगस्त* के संदर्भ में विशेष लेख : *खत्म हुआ पानी, तो कैसे बचेगी खेती-किसानी ?*
*”भारत की अगली कृषि-क्रांति उत्पादन वृद्धि की नहीं, पानी की हर बूंद बचाने की होगी”*
“लेखक: डॉ. राजाराम त्रिपाठी
कृषि एवं ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ, पर्यावरणविद् एवं राष्ट्रीय संयोजक अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा),
पांच सवाल, जिनसे भारत को अब भागना नहीं चाहिए:-
👉भूजल का संकट: भारत 2025 में 247.22 अरब घन मीटर भूजल निकाल चुका है, 730 भूजल आकलन इकाइयां अतिदोहित हैं।
👉किसान और जल: देश के कुल भूजल दोहन का लगभग 87 प्रतिशत कृषि में जा रहा है।
👉तालाबों का बेदर्दी से अंत: रायपुर जैसे देश भर के बहुसंख्य शहरों और कस्बों में कभी वर्षाजल और भूजल पुनर्भरण की रीढ़ रहे सैकड़ों तालाब विकास की भेंट चढ़ चुके हैं, यह आज भी जारी है ।
👉ऊर्जा से एथेनॉल तक: सौर ऊर्जा की गलत भूमि-योजना और एथेनॉल के लिए ‘जल-गहन फसलों’ का विस्तार जल-संकट को नई दिशा दे सकता है।
👉जलवायु का अगला प्रहार: अनियमित मानसून, अत्यधिक वर्षा, लंबे सूखे और बढ़ते तापमान के बीच वर्षाजल संचयन और भूजल पुनर्भरण अब विकल्प नहीं, राष्ट्रीय अनिवार्यता हैं।औद्योगिक नीतियों में ‘जल-पदचिह्न’ (Water Foot Print) भी जांचा जांचना होगा
23 से 27 अगस्त तक ‘विश्व जल सप्ताह’ World Water Week 2026 मनाया जा रहा है। इस वर्ष इसका विषय है “Water for People and Progress”, अर्थात लोगों और प्रगति के लिए जल। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह आयोजन जल-सुरक्षा, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और बदलती जलवायु में समानतापूर्ण जल-प्रबंधन पर केंद्रित है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत के लिए जल केवल पांच दिन चर्चा का विषय है?
जिस देश की सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई, जिसने हजारों वर्षों पहले बावड़ियां, तालाब, कुएं, झीलें और जल-संरक्षण की सामुदायिक प्रणालियां विकसित कीं, वही देश आज पानी के लिए टैंकरों और हजारों फीट गहरे बोरवेल पर निर्भर होता जा रहा है। हमने जल को संसाधन नहीं, मानो असीमित विरासत समझ लिया है।
भारत के सामने भूजल का सबसे बड़ा खतरा है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2025 के नवीनतम आकलन के अनुसार देश में प्रतिवर्ष लगभग 448.52 अरब घन मीटर भूजल का पुनर्भरण होता है, जबकि लगभग 407.75 अरब घन मीटर वार्षिक रूप से निकाला जा सकने वाला भूजल संसाधन है। इसके मुकाबले वास्तविक वार्षिक भूजल दोहन 247.22 अरब घन मीटर तक पहुंच गया है। राष्ट्रीय स्तर पर दोहन की अवस्था 60.63 प्रतिशत है। लेकिन औसत आंकड़ा असली संकट को छिपा देता है। 6,762 आकलन इकाइयों में से 730 यानी 10.80 प्रतिशत अतिदोहित, 201 गंभीर और 758 अर्द्ध-गंभीर श्रेणी में हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि भूजल दोहन में सबसे बड़ा हिस्सा कृषि का है। 2024 के आकलन में देश के कुल भूजल दोहन का लगभग 87 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में गया।
यहां किसान को दोषी ठहराना आसान है, लेकिन समस्या केवल किसान की नहीं है। हमने ऐसी कृषि नीति बनाई जिसमें अधिक पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन मिला, बिजली सस्ती या मुफ्त हुई, सिंचाई का वास्तविक मूल्य गायब हुआ और भूजल को निजी खेत की मुफ्त संपत्ति जैसा समझ लिया गया। पंजाब इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहां मुफ्त बिजली और ट्यूबवेल आधारित कृषि ने भूजल दोहन को तेज किया। शोधों में पंजाब में भूजल दोहन और गिरते जलस्तर को कृषि बिजली नीति तथा धान-गेहूं आधारित व्यवस्था से जोड़ा गया है।
लेकिन किसान अकेला दोषी नहीं है। शहरों ने भी जल की हत्या की है।
रायपुर को कभी तालाबों का शहर कहा जाता था। केंद्रीय भूजल बोर्ड के रायपुर शहरी क्षेत्र संबंधी दस्तावेज में ऐतिहासिक रूप से 123 तालाबों का उल्लेख है, जो वर्षाजल संचयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। अब इनकी संख्या लगभग 42 बताई गई है। अन्य ऐतिहासिक स्रोतों में रायपुर में इससे भी अधिक तालाबों की संख्या दर्ज मिलती है। अलग-अलग स्रोतों में आंकड़े अलग हैं, लेकिन कहानी एक ही है: तालाब घटे, कंक्रीट बढ़ा।
तालाब केवल पानी का गड्ढा नहीं था। वह वर्षा को रोकता था, धीरे-धीरे धरती में उतारता था, भूजल को रिचार्ज करता था, बाढ़ का वेग कम करता था और आसपास की जलवायु को संतुलित करता था। हमने तालाब पाटकर कॉलोनियां बना लीं और फिर उसी जमीन पर जलभराव से बचने के लिए करोड़ों रुपये की नालियां बना रहे हैं। यह कैसी विकास-व्यवस्था है?
आज भारी मशीनें धरती के सीने में हजारों फीट तक छेद कर रही हैं। लाखों वर्षों में भूगर्भीय प्रक्रियाओं से संचित जल को हम कुछ दशकों में निकाल रहे हैं। समस्या यह है कि हम भूजल को बैंक की तरह निकाल रहे हैं, लेकिन उसमें जमा कुछ नहीं कर रहे।
अब इस संकट में जलवायु परिवर्तन एक नया और भयावह अध्याय जोड़ रहा है। बारिश कम हो, ऐसा जरूरी नहीं। समस्या यह है कि बारिश का स्वरूप बदल रहा है। कहीं लंबे समय तक सूखा, फिर कुछ घंटों में अत्यधिक वर्षा। जब धरती पर कंक्रीट का आवरण हो, तालाब और जलधारण क्षेत्र समाप्त हो चुके हों और मिट्टी का संरक्षण कमजोर हो, तब तेज वर्षा का बड़ा हिस्सा बहकर निकल जाता है। हमें बाढ़ भी मिलती है और कुछ महीने बाद पानी का संकट भी।
अर्थात समस्या केवल “कितनी बारिश हुई” की नहीं है। असली प्रश्न है, “कितनी बारिश हमने धरती के भीतर पहुंचाई?”
दुनिया की तस्वीर भी बहुत आश्वस्त करने वाली नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार वैश्विक स्तर पर नवीकरणीय मीठे जल संसाधनों का लगभग 18.6 प्रतिशत 2021 में विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के लिए निकाला जा रहा था और वैश्विक जल तनाव 2015 की तुलना में बढ़ा है। दक्षिण और मध्य एशिया पहले से ही उच्च जल तनाव वाले क्षेत्रों में हैं।
भारत की चुनौती इसलिए और बड़ी है क्योंकि हमारी विशाल आबादी, कृषि-निर्भर अर्थव्यवस्था और मानसून पर निर्भरता एक-दूसरे से जुड़ी हैं।
अब ऊर्जा संक्रमण को भी पानी के प्रश्न से अलग करके नहीं देखा जा सकता। सौर ऊर्जा निश्चित रूप से जीवाश्म ईंधनों की तुलना में कम जल-गहन बिजली विकल्पों में है, लेकिन बड़े सौर पार्कों के लिए भूमि परिवर्तन, स्थानीय जल-निकासी, पैनलों की सफाई और विशेष रूप से निर्माण प्रक्रिया के जल-पदचिह्न पर विचार जरूरी है। सौर ऊर्जा का विस्तार जल-सुरक्षा के विरुद्ध नहीं होना चाहिए, लेकिन जल-संवेदनशील भूमि पर उसकी योजना भी नहीं होनी चाहिए।
इसी तरह एथेनॉल को केवल पेट्रोल में कमी और विदेशी मुद्रा बचत के चश्मे से देखना अधूरा राष्ट्रीय हिसाब है। नीति आयोग के अध्ययन ने स्वयं बताया था कि गन्ना अत्यधिक जल-गहन फसल है और उसके आधार पर एक लीटर एथेनॉल के लिए लगभग 3,000 लीटर पानी तक का जल-पदचिह्न सामने आता है। बाद के नीति विश्लेषणों में मक्का और चावल आधारित एथेनॉल के जल-पदचिह्न को भी गंभीर बताया गया है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि एथेनॉल अच्छा है या बुरा। प्रश्न होना चाहिए: हम एक लीटर वैकल्पिक ईंधन के लिए कितने लीटर पानी खर्च कर रहे हैं और वह पानी कहां से आ रहा है?
इसी तरह कृषि में भी सवाल यह नहीं होना चाहिए कि किसान कितना उत्पादन कर रहा है। सवाल यह होना चाहिए कि एक किलो अनाज पैदा करने में कितना पानी खर्च हो रहा है।
भारत ने जल संरक्षण के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। भूजल पुनर्भरण, जल शक्ति अभियान, अमृत सरोवर, सूक्ष्म सिंचाई, वर्षाजल संचयन और जलभृत प्रबंधन जैसे प्रयास हो रहे हैं। सरकार अब भूजल संसाधनों का वार्षिक आकलन भी कर रही है।
लेकिन प्रयासों और संकट के आकार में अभी भी बड़ा अंतर है।
हमें जल संरक्षण को योजना और अभियान से निकालकर कृषि नीति, ऊर्जा नीति, शहरी नियोजन और औद्योगिक नीति के केंद्र में रखना होगा।
किसान को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि पानी बचाइए। उसे ऐसी फसल नीति, मूल्य नीति और बिजली नीति देनी होगी जिसमें पानी बचाने वाला किसान आर्थिक रूप से भी लाभ में रहे। धान की जगह कम पानी वाली फसलों को अपनाने पर केवल सलाह नहीं, सुनिश्चित बाजार और बेहतर मूल्य चाहिए।
गांवों में हर खेत के लिए वर्षाजल रोकने की योजना बनानी होगी। खेत-तालाब, मेड़बंदी, कंटूर बंडिंग, छोटे जलाशय, पारंपरिक तालाब और सामुदायिक जल-संरचनाओं को पुनर्जीवित करना होगा। शहरों में हर नई इमारत को वर्षाजल संचयन से जोड़ना होगा और तालाबों के कैचमेंट क्षेत्र को कानूनी सुरक्षा देनी होगी।
पेड़ केवल कार्बन सोखने के लिए नहीं हैं। वनस्पति मिट्टी को पकड़ती है, वर्षा की बूंदों की गति कम करती है, जल को भूमि में उतरने का अवसर देती है और स्थानीय जल-चक्र को मजबूत करती है। इसलिए जल संरक्षण, मृदा संरक्षण और वृक्षारोपण को अलग-अलग कार्यक्रम मानना ही हमारी बड़ी भूल है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज भारत में राजनीति हमारे सार्वजनिक जीवन पर इतना हावी हो चुकी है कि भविष्य के वास्तविक प्रश्न पीछे छूटते जा रहे हैं। टेलीविजन से लेकर YouTube, Instagram और हर राजनीतिक बहस में सत्ता, चुनाव, आरोप और प्रत्यारोप का शोर है। राजनीति का ऐसा कुहासा छा गया है जिसमें हमें सामने खड़ी खाई दिखाई नहीं दे रही।
लेकिन पानी चुनाव नहीं लड़ता।
भूजल वोट नहीं देता।
सूखा किसी दल की सरकार देखकर नहीं आता।
और प्यास की कोई विचारधारा नहीं होती।
धरती के भीतर जमा जल किसी सरकार की संपत्ति नहीं, आने वाली पीढ़ियों की अमानत है।
विश्व जल सप्ताह हमें केवल जल पर भाषण देने का अवसर नहीं देता। यह आत्मपरीक्षण का अवसर है। हमें तय करना होगा कि हम अगली पीढ़ी को कैसी धरती देंगे। ऐसी धरती, जिसमें हजारों फीट नीचे जाकर भी पानी न मिले, या ऐसी धरती जहां वर्षा की हर बूंद को सम्मान मिले?
भारत की अगली कृषि-क्रांति शायद नई मशीन, नया बीज या नया रसायन नहीं होगी।
अगली कृषि-क्रांति पानी की हर बूंद की कीमत समझने वाली कृषि होगी।
और यदि हमने अभी भी वर्षाजल को बहने दिया, तालाबों को मिटने दिया, भूजल को पंपों से खाली किया और जल-गहन कृषि तथा औद्योगिक नीतियों को बिना ‘जल-पदचिह्न’ (Water Foot Print) देखे आगे बढ़ाया, तो आने वाले वर्षों में भारत की सबसे बड़ी समस्या खाद्य सुरक्षा नहीं, खाद्य पैदा करने के लिए पानी की उपलब्धता होगी।
अब भी समय है।
धरती के भीतर के जल को बचाइए। वर्षा की हर बूंद को रोकिए। तालाबों को लौटाइए। मिट्टी को बचाइए। पेड़ लगाइए। और कृषि की सफलता को केवल प्रति एकड़ उत्पादन से नहीं, पानी की प्रति बूंद उत्पादन से मापना शुरू कीजिए।
क्योंकि आने वाले भारत का सबसे महंगा संसाधन पेट्रोल, बिजली या कुछ और नहीं पानी होगा।






