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दंडकारण्य की साहित्य परंपरा के एक युग का अवसान, डॉ (प्रो). बी. एल. झा को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि

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: दंडकारण्य की साहित्य परंपरा के एक युग का अवसान, डॉ (प्रो). बी. एल. झा को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि,

प्रमुख बिंदु :-
• छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य परिषद, कोंडागांव एवं राष्ट्रीय पत्रिका ककसाड़ के संयुक्त तत्वावधान में श्रद्धांजलि सभा सम्पन्न।
• शिक्षाविद, भाषाविद, रामकथा शिरोमणि एवं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार डॉ. बी. एल. झा के व्यक्तित्व-कृतित्व पर विस्तृत विमर्श।
• डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने कहा, “डॉ. झा के जाने से दंडकारण्य की साहित्य परंपरा के एक युग का अंत हो गया।”
• सभी साहित्यकारों ने दो मिनट का मौन रख भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य परिषद, कोंडागांव तथा जनजातीय सरोकारों की राष्ट्रीय पत्रिका ककसाड़ के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को माँ दंतेश्वरी हर्बल इस्टेट के बईठका हॉल में बस्तर अंचल के प्रख्यात शिक्षाविद, भाषाविद, साहित्यकार एवं आध्यात्मिक चिंतक डॉ. बी. एल. झा की स्मृति में गरिमामय श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। कार्यक्रम दो चरणों में सम्पन्न हुआ। प्रथम चरण में उनके व्यक्तित्व, कृतित्व एवं उनसे जुड़े संस्मरणों पर विस्तृत परिचर्चा हुई, जबकि द्वितीय चरण में उपस्थित साहित्यकारों एवं प्रबुद्धजनों ने दो मिनट का मौन रख उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।
कार्यक्रम का संचालन सुप्रसिद्ध शायर सैयद तौसीफ आलम ने अपने विशिष्ट एवं प्रभावशाली अंदाज में किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक समाजसेवी आरके जैन थे तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता जनजातीय सरोकारों की राष्ट्रीय मासिक पत्रिका ‘ ककसाड़ ‘ के संपादक डॉ. राजाराम त्रिपाठी थे। विशिष्ट अतिथियों में कोंडागांव के लोकप्रिय पार्षद एवं समाजसेवी मनीष श्रीवास्तव, छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य परिषद इकाई कोंडागांव के अध्यक्ष हरेंद्र यादव, मोहम्मद यासीन, सम्पदा स्वयंसेवी संस्थान की सचिव शिप्रा त्रिपाठी तथा साहित्यकार एवं कवि जमील खान उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के प्रथम चरण का शुभारंभ परिषद के कोषाध्यक्ष बृजेश तिवारी ने डॉ. बी. एल. झा के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उन्हें विनम्र, विद्वान एवं ज्ञान का अथाह सागर बताया तथा उनसे जुड़े अनेक संस्मरण साझा किए। मनीष श्रीवास्तव ने उन्हें समाज को दिशा देने वाला साहित्यकार बताते हुए उनके तथा उनके सुपुत्र साहित्यकार हिमांशु शेखर झा से जुड़े प्रेरक प्रसंग सुनाए। राष्ट्रपति पदक प्राप्त शिक्षक आर. के. जैन ने उनके साथ बिताए आत्मीय क्षणों को साझा किया। हरेंद्र यादव ने कोंडागांव प्रवास की स्मृतियों को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। साहित्यकार जमील खान ने कहा कि साहित्यकार कभी नहीं मरते, वे अपनी कृतियों के माध्यम से सदैव समाज के हृदय में जीवित रहते हैं। उन्होंने डॉ. झा को समाज के प्रति पूर्णतः समर्पित शिक्षाविद एवं साहित्यकार बताया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने अत्यंत भावुक शब्दों में कहा कि “डॉ. बी. एल. झा के निधन से दंडकारण्य की साहित्यिक परंपरा के एक गौरवशाली युग का अंत हो गया है। उनके विराट साहित्यिक, शैक्षिक और आध्यात्मिक योगदान का एक प्रतिशत भी समुचित मूल्यांकन आज तक नहीं हो पाया।” उन्होंने कहा कि डॉ. झा ने महर्षि वाल्मीकि कृत सम्पूर्ण रामायण के 24 हजार श्लोकों का हिंदी पद्यानुवाद कर एक असाधारण साहित्यिक साधना की, जिसके लिए उन्हें ‘रामकथा शिरोमणि’ की प्रतिष्ठित उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने इंग्लैंड, बेल्जियम, इंडोनेशिया सहित अनेक देशों में भारत की साहित्यिक, सांस्कृतिक परंपरा तथा भारतीय अध्यापक समुदाय का गौरवपूर्ण प्रतिनिधित्व किया। यह सौभाग्य की बात है कि इनके सुयोग्य सुपुत्र हिमांशु शेखर झा भी ख्याति प्राप्त कवि तथा समाजसेवी हैं तथा अपने पिता का नाम रोशन कर रहे हैं।
डॉ. त्रिपाठी ने आगे कहा कि डॉ. झा अध्यात्म के क्षेत्र में अत्यंत ऊँचे साधना स्तर पर पहुँच चुके थे, किंतु उन्होंने कभी उसका प्रदर्शन नहीं किया। उनका व्यक्तित्व जितना विराट था, उतना ही विनम्र भी था। उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि वे स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें डॉ. झा का सदैव पिता तुल्य स्नेह, मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त होता रहा। उन्होंने कहा, “इस परिसर में, जहाँ आज हम उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, यहीं आयोजित लगभग पाँच कार्यक्रमों में डॉ. झा की गरिमामयी उपस्थिति और आशीर्वाद हमें मिला था। आज वे भले ही सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, किंतु सूक्ष्म रूप में उनकी उपस्थिति और उनका आशीर्वाद हम आज भी अनुभव कर सकते हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि डॉ. बी. एल. झा जैसे बहुआयामी प्रतिभा के धनी, कर्मयोगी, साहित्य-साधक और आध्यात्मिक युगपुरुष कभी नहीं मरते। वे अपनी रचनाओं, अपने आदर्शों, अपनी शिक्षाओं और अपने जीवन मूल्यों के माध्यम से सदैव जीवित रहते हैं तथा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।
अंत में छत्तीसगढ़ हिंदी साहित्य परिषद के सचिव उमेश मंडावी ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों एवं उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के निदेशक अनुराग कुमार, शंकर नाग, माधुरी देवांगन, लालाराम नेताम, गोलेश नाग सहित बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी एवं प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

उमेश मंडावी: महासचिव, हिंदी साहित्य परिषद कोंडागांव छग।