Home Uncategorized अक्षय तृतीया पर विशेष लेख : *“अक्षय तृतीया : मुहूर्त, मिथक, खेती...

अक्षय तृतीया पर विशेष लेख : *“अक्षय तृतीया : मुहूर्त, मिथक, खेती और हमारा ‘अक्षय’ विवेक”

0
6

अक्षय तृतीया पर विशेष लेख : *“अक्षय तृतीया : मुहूर्त, मिथक, खेती और हमारा ‘अक्षय’ विवेक”

लेखक: डॉ. राजाराम त्रिपाठी, सामाजिक चिंतक।

 

मुख्य बिंदु (बॉक्स)

*अक्षय तृतीया स्वयंसिद्ध शुभ मुहूर्त मानी जाती है, इसलिए बिना पंचांग देखे हर मांगलिक और कृषि कार्य का आरंभ,*

 

*देश का 55-60% किसान मानसून आधारित,

अतः बीज चयन और कृषि तैयारी का यह वैज्ञानिक लोकपर्व,*

 

*कुछ क्षेत्रों में बाल विवाह की कुप्रथा से भी रहा इसका इसका जुड़ाव, पर कानून और जागरूकता से इसमें तेजी से आई कमी,*

 

*छत्तीसगढ़ और बस्तर में ‘अक्ती’ के रूप में यह पर्व कृषि, श्रम-सहयोग, बीज संरक्षण और सामुदायिक अर्थव्यवस्था का आधार,*

*परंपरा का सार: प्रकृति के साथ संतुलन; विकृति का खतरा: अंधानुकरण और सामाजिक कुप्रथाएं,*

 

भारतीय पंचांग में कुछ तिथियां ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर ज्योतिषी भी थोड़ी देर के लिए विश्राम कर लेते हैं। अक्षय तृतीया उन्हीं में से एक है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों अपनी उच्च स्थिति में होते हैं, यानी प्रकृति खुद कह रही होती है, “भाई, आज जो करना है कर लो, हम पूरी रोशनी में हैं।” इसलिए इसे “अबूझ मुहूर्त” कहा गया, सर्वसिद्धि योग कहा गया, यानी ऐसा दिन जब शुभ कार्य के लिए किसी गणना की आवश्यकता नहीं।

अब भारत जैसे देश में, जहां हर काम के पहले “मुहूर्त” और हर मुहूर्त के पहले “विचार-विमर्श” होता है, वहां एक ऐसा दिन मिल जाए जब कुछ भी करने के लिए अनुमति स्वतः मिल जाए, तो उत्साह स्वाभाविक है। विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार, खरीदारी, दान-पुण्य और सबसे महत्वपूर्ण, खेती का शुभारंभ, सब कुछ इस दिन किया जाता है।

इतिहास और पुराणों में भी इस तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इसी दिन त्रेता युग का आरंभ हुआ, गंगा का अवतरण हुआ, और भगवान परशुराम का जन्म हुआ। यही नहीं, भगवान कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को अक्षय समृद्धि का वरदान इसी दिन दिया था। अब इतने “अक्षय” प्रसंग एक ही दिन में जुड़ जाएं, तो तिथि की प्रतिष्ठा स्वतः बढ़ जाती है।

लेकिन भारतीय समाज की विशेषता यह है कि वह हर अच्छी चीज में थोड़ा “अपना मसाला” भी डाल देता है। यही कारण है कि अक्षय तृतीया जैसे सर्वशुभ दिन के साथ कई क्षेत्रों में बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं भी जुड़ गईं। तर्क यह दिया गया कि जब दिन इतना शुभ है, तो विवाह में देरी कैसी? परिणाम यह हुआ कि मासूम बचपन को भी “मुहूर्त” के नाम पर विदा किया जाने लगा। हालांकि, अब कानून, शिक्षा और जागरूकता ने इस प्रवृत्ति को काफी हद तक नियंत्रित किया है, पर यह उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि परंपरा और अंधानुकरण में कितना महीन अंतर होता है।

यदि हम इस पर्व के वास्तविक स्वरूप को समझना चाहें, तो हमें गांव की ओर देखना होगा। भारत की लगभग 55-60 प्रतिशत कृषि आज भी मानसून पर निर्भर है। ऐसे में अक्षय तृतीया वह दिन है, जब किसान आने वाले कृषि चक्र के लिए मानसिक, सामाजिक और तकनीकी रूप से तैयार होता है। बीजों का चयन, उनका संरक्षण, खेत की प्रारंभिक तैयारी और श्रम का संगठन, यह सब इस दिन की प्रक्रिया का हिस्सा है।

देश के विभिन्न हिस्सों में इस पर्व को अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। ओडिशा में ‘अखि मुंठी अनुकुल’ के तहत किसान धान के बीज बोने की औपचारिक शुरुआत करते हैं। बंगाल में ‘हल खाता’ के माध्यम से व्यापारी अपने नए लेखा वर्ष का शुभारंभ करते हैं। गुजरात और महाराष्ट्र में सोना खरीदने की परंपरा है, जो आर्थिक स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। उत्तर भारत में दान-पुण्य, जलसेवा और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व होता है।

परंतु यदि इस पर्व का सबसे प्रामाणिक और धरती से जुड़ा स्वरूप देखना हो, तो छत्तीसगढ़ और विशेषकर बस्तर की ओर रुख करना होगा, जहां यह “अक्ती” के नाम से जीवित है। यहां अक्षय तृतीया किसी शॉपिंग फेस्टिवल का नाम नहीं, बल्कि मिट्टी, बीज और पसीने के बीच होने वाला एक गंभीर अनुबंध है।

अक्ती के दिन बस्तर के गांवों में सुबह से ही एक अलग हलचल होती है। किसान अपने हल, फावड़े, कुदाल और बैलों को साफ करते हैं, उन पर हल्दी-चावल चढ़ाते हैं, और फिर सामूहिक रूप से खेत की ओर बढ़ते हैं। कहीं प्रतीकात्मक जुताई होती है, कहीं बीजों की पूजा, तो कहीं आगामी वर्षा के लिए लोकगीत गाए जाते हैं। यह पूरा आयोजन किसी “इवेंट मैनेजमेंट” कंपनी के बिना, पूरी सादगी और सामूहिकता के साथ संपन्न होता है।

इस दिन की एक और महत्वपूर्ण परंपरा है, आने वाले मानसून में की जाने वाली फसलों के बीजों का चयन और संरक्षण । आदिवासी समुदाय अपने पारंपरिक बीजों को बड़े जतन‌ से पीढ़ियों से सहेजकर रखते आए हैं। अक्ती के दिन इन बीजों को बाहर निकालकर उनकी गुणवत्ता की जांच की जाती है। कौन सा बीज इस बार बोया जाएगा, कौन सा सुरक्षित रखा जाएगा, यह निर्णय सामूहिक अनुभव के आधार पर लिया जाता है। बीजों को जंगल में पाए जाने वाले एक विशेष प्रजाति की बहु वर्षीय लता सिहाड़ी के पत्तों की बनाई बड़ी टोकरी नुमा पोटलियों में चूल्हे की राख तथा कुछ अन्य औषधीय पौधों की पत्तियों के साथ अलग-अलग बीजों को अलग-अलग पोटलियों में सुरक्षित रखा जाता है। पोटलियों के मुंह को हल्दी भांति सीलबंद करके पोटली के चारों ओर इसी लता से बनने वाली रस्सी को लपेट दिया जाता है। अब यह पोटली,, बीजों के सुरक्षा के दृष्टिकोण से सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक सीड बैंक की भूमिका निभाती है। इसका मतलब यह हुआ कि आधुनिक कृषि विज्ञान जिस “सीड बैंक” की बात करता है, वह तो अपने सर्वश्रेष्ठ सस्टेनेबल स्वरूप में बस्तर के गांवों में सदियों से व्यवहार में है।

अक्ती केवल कृषि का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक अर्थव्यवस्था का भी आधार है। इस दिन गांवों में यह तय होता है कि किसके खेत में कब काम होगा, कौन किसकी मदद करेगा, किसके पास बैल नहीं हैं, उसे किस तरह सहयोग दिया जाएगा। यह “लेबर एक्सचेंज” की ऐसी प्रणाली है, जिसमें न कोई अनुबंध है, न कोई बैंक गारंटी, फिर भी यह व्यवस्था वर्षों से सफलतापूर्वक चल रही है।

जनजातीय जीवन में इस पर्व का एक और गहरा अर्थ है, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता। यहां जंगल, जमीन और जल को संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता माना जाता है। अक्ती के दिन यह स्वीकार किया जाता है कि खेती केवल मनुष्य का परिश्रम नहीं, बल्कि प्रकृति की कृपा का भी परिणाम है।

आज अक्षय तृतीया का एक नया, चकाचौंध भरा रूप हमारे सामने खड़ा है, जहां परंपरा से अधिक बाजार की आवाज़ सुनाई देती है। अखबारों के पूरे पन्ने “शुभ मुहूर्त” के नाम पर सोना-चांदी खरीदने के विज्ञापनों से पटे रहते हैं, टीवी चैनलों पर ऑफर और डिस्काउंट की ऐसी वर्षा होती है मानो समृद्धि अब केवल क्रेडिट-कार्ड से मिलने लगी हो। ज्योतिष के नाम पर ऐसे कालनेमि “विशेषज्ञों” की भी भरमार हो गई है, जो इस तिथि को केवल उपभोग का अंतिम-उत्सव सिद्ध करने में जुटे हैं। परिणाम यह हुआ कि जो पर्व कभी बीज, मिट्टी, श्रम, खेती और खलिहान के साथ जुड़ा था, वह धीरे-धीरे शापिंग माल, शोरूम, स्कीम और सेल का पर्याय बनता जा रहा है। लोक परंपरा, जो सामूहिकता और प्रकृति के संतुलन पर आधारित थी, अब बाजार के दबाव में हाशिये पर चली गई है। यह परिवर्तन केवल एक पर्व का रूपांतरण नहीं, बल्कि उस चेतना का क्षरण है, जिसमें “अक्षय” का अर्थ स्थायी जीवन मूल्य हुआ करता था, न कि क्षणिक उपभोग। आज जब आधुनिकता तथा विकास के नाम पर हम हर अच्छी चीज को “मार्केट” में बदलने में लगे हुए हैं, तब अक्षय-तृतीया का यह स्वरूप हमें आईना दिखाता है। एक ओर शहरों में यह दिन सोना खरीदने और ऑनलाइन ऑफर्स का प्रतीक बन गया है, वहीं दूसरी ओर राजमार्ग से दूर के गांवों में यह अब भी मिट्टी से जुड़ा हुआ है। प्रश्न यह नहीं कि कौन सा रूप कितना सही है, बल्कि यह है कि क्या हम उस मूल भावना को बचा पा रहे हैं, जो इस पर्व का आधार है?

महात्मा गांधी ने कहा था, “भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है।” यदि यह कथन आज भी सत्य है, तो अक्षय तृतीया और अक्ती जैसे पर्व उस आत्मा की धड़कन हैं।

 

अंत में एक असहज पर जरूरी सच भी स्वीकार करना होगा कि इस धरती पर वास्तव में कुछ भी “अक्षय” नहीं है, न प्रकृति में, न संसाधनों में, और न ही हमारी खेती में। जिस भूमि ने कभी 40 करोड़ लोगों का पेट भरा, वही आज 140 करोड़ का भार ढो रही है। यह अपने आप में हमारे कृषक समाज की क्षमता का प्रमाण जरूर है, पर साथ ही एक चेतावनी भी। रासायनिक खादों, कीटनाशकों और त्वरित उत्पादन की होड़ ने इस तथाकथित “अक्षय पात्र” की ऊपरी परत को भीतर से खोखला कर दिया है। विभिन्न आकलनों के अनुसार देश की लगभग 30-35 प्रतिशत कृषि भूमि की उत्पादकता में गिरावट दर्ज की जा चुकी है, और कई क्षेत्रों में यह क्षरण 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह एक अत्यंत गंभीर चेतावनी है।

विडंबना देखिए, हम अक्षय तृतीया पर सोना चांदी खरीदकर “अक्षय संपदा” होने का भ्रम पालते हैं, जबकि हमारे खेतों की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे “क्षय” की ओर बढ़ रही है। शायद यह पर्व हमें बाजार के चमकते शो-रूम से थोड़ा बाहर निकलकर खेत की उस मिट्टी तक ले जाने के लिए है, जहां असली अक्षयता की परीक्षा हो रही है। यदि इस दिन हम सचमुच कोई संकल्प लेना चाहते हैं, तो वह यह होना चाहिए कि खेती को फिर से टिकाऊ, संतुलित और प्रकृति के अनुकूल बनाया जाए, अन्यथा आने वाली पीढ़ियां हमसे यह जरूर पूछेंगी कि जब सब कुछ “अक्षय” था, तब हमने उसे “क्षय” क्यों होने दिया,और आज अक्षय-तृतीया पर्व पर भी हमारे हाथ रीते क्यों हैं।