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विनोद कुमार शुक्ल ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित, छत्तीसगढ़ के रायपुर में निवास पर दिया गया सम्मान

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हिंदी के शीर्ष कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल को हिंदी का सर्वाेच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार, उनके रायपुर स्थित निवास पर दिया गया। ज्ञानपीठ के महाप्रबंधक आरएन तिवारी ने सम्मान के साथ उन्हें वाग्देवी की प्रतिमा और 11 लाख रुपये पुरस्कार का चेक प्रदान किया। .

विनोद कुमार शुक्ल ने अपने पाठकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा- “जब हिन्दी भाषा सहित तमाम भाषाओं पर संकट की बात कही जा रही है, मुझे पूरी उम्मीद है नई पीढ़ी हर भाषा का सम्मान करेगी। हर विचारधारा का सम्मान करेगी। किसी भाषा या अच्छे विचार का नष्ट होना, मनुष्यता का नष्ट होना है।

विनोद कुमार शुक्ल ने कहा कि “मुझे बच्चों, किशोरों और युवाओं से बहुत उम्मीदें हैं। मैं हमेशा कहता रहा हूँ कि हर मनुष्य को अपने जीवन में एक किताब जरूर लिखनी चाहिए। अच्छी किताबें हमेशा साथ होनी चाहिए। अच्छी किताब को समझने के लिए हमेशा जूझना पड़ता है। किसी भी क्षेत्र में शास्त्रीयता को पाना है तो उस क्षेत्र के सबसे अच्छे साहित्य के पास जाना चाहिए।

आलोचनाओं को अपनी ताकत बना लें

आलोचना को लेकर शुक्ल ने कहा कि “किसी अच्छे काम की आलोचना अगर की जाती है तो उन आलोचनाओं को अपनी ताकत बना लें। आलोचना जो है, दूसरों का विचार है, जो उपयोगी या अनुपयोगी हो सकता है। किसी कविता की सबसे अच्छी आलोचना का उत्तर उससे अच्छी एक और नयी कविता को रच देना है। किसी काम की सबसे अच्छी आलोचना का उत्तर, उससे और अच्छा काम करके दिखाना होना चाहिए। साहित्य में गलत आलोचनाओं ने अच्छे साहित्य का नुक़सान ज्यादा किया है।

अकेले चलो. चलते रहो

शुक्ल ने कहा कि “जीवन में असफलताएँ, गलतियाँ, आलोचनाएँ सभी तरफ़ बिखरी पड़ी मिल सकती हैं, वे बहुत सारी हो सकती हैं. उस बिखराव के किसी कोने में अच्छा, कहीं छिटका सा पड़ा होगा। दुनिया में जो अच्छा है, उस अच्छे को देखने की दृष्टि हमें स्वयं ही पाना होगा। इसकी समझ खुद विकसित करनी होगी। हमें अपनी रचनात्मकता पर ध्यान देना चाहिए। जब कहीं, किसी का साथ न दिखाई दे, तब भी चलो. अकेले चलो. चलते रहो. जीवन में उम्मीद सबसे बड़ी ताकत है. मेरे लिये पढ़ना और लिखना साँस लेने की तरह है।

इससे पहले उन्होंने अपनी एक कविता का भी पाठ किया-

सबके साथ
सबके साथ हो गया हूँ
अपने पैरों से नहीं
सबके पैरों से चल रहा हूँ
अपनी आँखों से नहीं
सबकी आँखों से देख रहा हूँ
जागता हूँ तो सबकी नींद से
सोता हूँ तो सबकी नींद में
मैं अकेला नहीं
मुझमें लोगों की भीड़ इकट्ठी है
मुझे ढूँढो मत
मैं सब लोग हो चुका हूँ
मैं सबके मिल जाने के बाद
आख़िर में मिलूँगा
या नहीं मिल पाया तो
मेरे बदले किसी से मिल लेना।

विनोद कुमार शुक्ल के बारे में

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में 1 जनवरी 1937 को जन्मे, लगभग 90 की उम्र के होने को आए विनोद कुमार शुक्ल हिंदी साहित्य के ऐसे रचनाकार हैं, जो बहुत धीमे बोलते हैं, लेकिन साहित्य की दुनिया में उनकी आवाज़ बहुत दूर तक सुनाई देती है। मध्यमवर्गीय, साधारण और लगभग अनदेखे रह जाने वाले जीवन को शब्द देते हुए हिंदी में एक बिल्कुल अलग तरह की संवेदनशील, न्यूनतम और जादुई दुनिया रची. वे उन दुर्लभ लेखकों में हैं, जिनके यहाँ एक साधारण कमरा, एक खिड़की, एक पेड़, एक कमीज़ या घास का छोटा-सा टुकड़ा भी किसी पूरे ब्रह्मांड की तरह खुल जाता है।

उनका पहला कविता संग्रह ‘लगभग जय हिन्द’ 1971 में आया और वहीं से उनकी विशिष्ट भाषिक बनावट, चुप्पी और भीतर तक उतरती कोमल संवेदनाएँ हिंदी कविता में दर्ज होने लगीं. आगे चलकर ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह’ (1981), ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ (1992), ‘अतिरिक्त नहीं’ (2000), ‘कविता से लंबी कविता’ (2001), ‘आकाश धरती को खटखटाता है’ (2006), ‘पचास कविताएँ’ (2011), ‘कभी के बाद अभी’ (2012), ‘कवि ने कहा’, चुनी हुई कविताएँ (2012) और ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ (2013) जैसे संग्रहों ने उन्हें समकालीन हिंदी कविता के सबसे मौलिक स्वरों में शुमार कर दिया. उनकी कविताएँ बोलने से ज़्यादा सुनने वाली, नारेबाज़ी से कहीं अधिक, धीमी फुसफुसाहट की तरह काम करती हैं, लेकिन असर उनका बहुत दीर्घकालिक है।

उनके उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ (1979) ने हिंदी कथा-साहित्य में एक नया मोड़ दिया। जिस पर मणि कौल ने फिल्म भी बनाई. इसके बाद ‘खिलेगा तो देखेंगे’ (1996), ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ (1997, साहित्य अकादमी पुरस्कार), ‘हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़’ (2011), ‘यासि रासा त’ (2016) और ‘एक चुप्पी जगह’ (2018) के माध्यम से उन्होंने लोकआख्यान, स्वप्न, स्मृति, मध्यवर्गीय जीवन और मनुष्य की अस्तित्वगत जटिल आकांक्षाओं को एक नये कथा-ढांचे में समाहित किया।

कहानी-संग्रह ‘पेड़ पर कमरा’ (1988), ‘महाविद्यालय’ (1996), ‘एक कहानी’ (2021) और ‘घोड़ा और अन्य कहानियाँ’ (2021) में भी वही सूक्ष्म, घरेलू और लगभग उपेक्षित जीवन-कण अद्भुत कथा-समृद्धि के साथ उपस्थित होते हैं।

उनकी रचनाएँ अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हुईं. ‘The Servant’s Shirt’, ‘A Window Lived In The Wall’, ‘Once It Flowers’, ‘Moonrise From The Green Grass Roof’, ‘Blue Is Like Blue’, ‘The Windows In Our House Are Little Doors’जैसे अंग्रेज़ी अनुवादों ने उन्हें वैश्विक पाठकों तक पहुँचाया. ‘नौकर की कमीज़’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के साथ ‘पेड़ पर कमरा’ और अनेक कविताएँ विदेशी तथा भारतीय भाषाओं में रूपांतरित होकर एक व्यापक पाठक-वृत्त तक पहुँचीं. कई रचनाओं पर फिल्में बनीं, नाटक लिखे गए।

क्या है ज्ञानपीठ पुरस्कार

ज्ञानपीठ पुरस्कार भारतीय साहित्य में सबसे अधिक प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता है। भारतीय ज्ञानपीठ की स्थापना स्व.साहू शांतिप्रसाद जैन ने की थी। संस्थापक अध्यक्ष स्व.श्रीमती रमा जैन थीं। वास्तव में यह पुरस्कार भारतीय साहित्य की समेकित साहित्य दृष्टि और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन गया है। पुरस्कार समारोह के अवसर पर सम्मानित साहित्यकार को प्रशस्ति पत्र के साथ ‘वाग्देवी’ की कांस्य प्रतिमा एवं 11 लाख रुपये की राशि भेंट की जाती है। सन् 1965 से 2024 तक 59 वर्षों की अवधि में 65 साहित्यकार पुरस्कृत हो चुके हैं।

साहित्य अकादमी पुरस्कार

साहित्य अकादमी पुरस्कार, गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप, रज़ा पुरस्कार, शिखर सम्मान, राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान, हिंदी गौरव सम्मान,‘Blue Is Like Blue’ के लिए मातृभूमि पुरस्कार, साहित्य अकादमी का महत्तर सदस्य सम्मान और 2023 का पैन-नाबोकोव पुरस्कार जैसी उपलब्धियाँ उनके दीर्घ, शांत और गहन रचनात्मक सफ़र की सार्वजनिक स्वीकृति हैं। लेकिन, इन सब के बीच उनका लेखक-स्वर वही बना रहा-संकोची, आंतरिक, लगभग अदृश्य, जो शब्दों की अत्यधिक सजावट से बचते हुए, बेहद सरल वाक्यों में हमारे भीतर एक खिड़की खोल देता है, जहाँ से दुनिया थोड़ी और मानवीय, थोड़ी और कल्पनाशील और थोड़ी और सच दिखाई देने लगती है।

वाग्देवी पुरस्कार प्रतीक

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार को वाग्देवी की कांस्य प्रति भेंट की जाती है। ज्ञानपीठ पुरस्कार के प्रतीक के रूप में स्वीकार वाग्देवी सरस्वती की कांस्य मूर्ति सरस्वती कण्ठाभरण प्रासाद नामक मंदिर में विराजमान थी। जिसका निर्माण मध्यप्रदेश की धारा नगरी में विद्याव्यसनी नरेश भोज ने 1035 ई. में कराया था। अब यह मूर्ति लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शित है। भारतीय ज्ञानपीठ ने वाग्देवी के मस्तक के पृष्ठ भाग में प्रभामंडल सम्मिलित किया है। जिसमें मथुरा में कंकाली टीला से प्राप्त प्राचीनतम जैन तोरण ‘रत्न त्रय’ का प्रतीक शामिल है। वाग्देवी द्वारा ग्रहित पुस्तक कमण्डुलु अक्षमाला और कमल क्रमशः ज्ञान, संयम वैराग्य और अंतदृष्टि के प्रतीक हैं।

अब तक इन साहित्यकारों को मिल चुका है ज्ञानपीठ पुरस्कार

गोविंद शंकर कुरुप 1965, ताराशंकर बन्द्योपाध्याय 1966, उमाशंकर जोशी 1967, केवी पुट्टपा 1967, सुमित्रानंदन पंत 1968, फिराक गोरखपुरी 1969, विश्वनाथ सत्यनारायण 1970, विष्णु डे 1971, रामधारी सिंह दिनकर 1972, डा.आर बेंद्रे 1973, गोपीनाथ मोहंती 1973, वीएस खांडेकर 1974, पीवी अकिलंदम 1975, आशापूर्ण देवी 1976, के.शिवराम कारंत 1977, एसएचवी अज्ञेय 1978, वीरेंद्र कुमार भट्टाचार्य 1979, एसके पोट्टेकाट 1980, अमृता प्रीतम 1981, महादेवी वर्मा 1982, मास्ति वी.अय्यंगार 1983, तकज्ही एस.पिल्ले 1984, पन्नालाल पटेल 1985, सच्चिदानंद राउतराय 1986, वीवीएस कुसुमाग्रज 1987, सी.नारायण रेड्डी 1988, कुर्रतुलऐन हैदर 1989, विनायक कृष्ण गोकाक 1990, सुभाष मुखोपाध्याय 1991, नरेश मेहता 1992, सीताकांत महापात्र 1993, यूआर अनंतमूर्ति 1994, एमटी वासुदेवन नायर 1995, महाश्वेता देवी 1996, अली सरदार जाफरी 1997, गिरीश कर्नाड 1998, निर्मल वर्मा 1999, गुरदयाल सिंह 1999, इंदिरा गोस्वामी 2000, राजेंद्र शाह 2001, डी.जयकांतन 2002, विंदा करंदीकर 2003, रहमान राही 2004, कुंवर नारायण 2005, रवीन्द्र केलेकर 2006, सत्यव्रत शास्त्री 2006, ओएनवी कुरुप 2007, शहरयार 2008, अमरकांत 2009, श्रीलाल शुक्ल 2009, चंद्रशेखर कंबार 2010, प्रतिभा राय 2011, रावूरि भारद्वाज 2012, केदारनाथ सिंह 2013, भालचंद्र नेमाड़े 2014, रघुवीर चौधरी 2015, शंख घोष 2016, कृष्णा सोबती 2017, अमिताभ घोष 2018, अक्कितम अच्यूतन नंबूदिरि 2019, नीलमणि फुकन 2021, दामोदर मावजो 2022, स्वामी रामभद्राचार्य 2023, गुलजार 2023 और विनोदकुमार शुक्ल 2024।