
सरगुजा . सरगुजा संभाग के घने जंगल… शांत पहाड़ियां… और करोड़ों वर्ष पुरानी चट्टानों के बीच छुपा था एक ऐसा खज़ाना, जिसे दुनिया देख नहीं पाई थी। मनेंद्रगढ़ का गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क—29 करोड़ वर्ष पुराने समुद्री जीवों की निशानियां समेटे—अपनी कहानी कहने को जैसे बेचैन था। लेकिन इसकी पहचान सीमित थी… और इसकी अनोखी विरासत धूल में दबकर रह गई थी।
इसी दौरान इस क्षेत्र में पदस्थ हुए एक युवा और ऊर्जावान अधिकारी—डीएफओ मनीष कश्यप।
उन्होंने इस जमीन को सिर्फ जंगल के रूप में नहीं देखा… बल्कि इतिहास के उन पन्नों के रूप में देखा जो अभी लिखे ही नहीं गए थे।उन्होंने महसूस किया कि यह सिर्फ फॉसिल पार्क नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता की विज्ञान कथा है, जो दुनिया को सुनाई जानी चाहिए।

फिर शुरू हुई एक यात्रा—संरक्षण की, नवाचार की और विश्वास की।
फॉसिल साइट को वैज्ञानिक ढंग से विकसित किया गया…
35 प्रागैतिहासिक जीवों की मूर्तियाँ बनाई गईं… कैक्टस गार्डन, मॉडर्न इंटरप्रिटेशन सेंटर, और हसदेव नदी में बोटिंग जैसी सुविधाओं ने इस जगह को नया जीवन दिया। अप्रैल 2025 में उद्घाटन के बाद देखते ही देखते 13,000 से अधिक पर्यटक यहां पहुंचे।जगह बदली… लोग जुड़े… और एक भूली-बिसरी धरोहर ने फिर से सांस ली। और फिर—दिल्ली में एक ऐतिहासिक पल आया।
“Nexus of Good Foundation Awards 2025” में
देशभर के 150 नवाचारों में से सिर्फ 26 चुने गए और उनमें शामिल था – मनेंद्रगढ़ का यह सपना…
और वह व्यक्ति जिसने इसे संभव बनाया—डीएफओ मनीष कश्यप।
यह लगातार दूसरा वर्ष था जब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला।
पहले उनके “महुआ बचाओ अभियान” ने देशभर में पहचान दिलाई थी और अब गोंडवाना की यह कहानी उन्हें एक और ऊंचाई पर ले गई।
आज यह पार्क सरगुजा संभाग का नया टूरिस्ट हॉटस्पॉट है।
लेकिन असली कहानी सिर्फ पर्यटन की नहीं… यह कहानी है दृष्टि रखने वाले एक अधिकारी की, जो 29 करोड़ वर्ष पुराने अतीत को आने वाले करोड़ों लोगों तक पहुँचाने का साधन बन गए। गोंडवाना की मिट्टी में अब सिर्फ फॉसिल नहीं हैं…यहां उम्मीदें हैं, नवाचार है… और एक संदेश है—
कि अगर इरादे साफ़ हों, तो इतिहास भी भविष्य की नई राहें दिखा सकता है।




