
भरत सिंह चौहान की रिपोर्ट
– होली के रंग अभी फीके नहीं पड़े हैं । जांजगीर-चांपा जिले के पंतोरा गांव में एक अनोखी परंपरा निभाई गई।यहां होली के पांचवें दिन यानी रंग पंचमी पर लट्ठमार होली खेली जाती है। इस परंपरा को देखने और इसमें शामिल होने के लिए दूर-दूर से लोग पंतोरा पहुंचे
।गांव की कुंवारी कन्याएं बांस की छड़ियों से लोगों को मारकर यह अनोखा त्योहार मनाती हैं, जिसे स्थानीय भाषा में डंगाही होली कहा जाता है।
जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर कोरबा रोड पर स्थित पंतोरा गांव में रंग पंचमी के दिन लट्ठमार होली की सदियों पुरानी परंपरा निभाई गई। यह परंपरा राधा के गांव बरसाने की लट्ठमार होली की तर्ज पर मनाई जाती है।
बलौदा ब्लॉक के पंतोरा गांव में स्थित मां भवानी मंदिर परिसर में इस दिन बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटते हैं। रंग पंचमी से एक दिन पहले गांव के लोग कोरबा जिले के मड़वारानी के जंगल से बांस की छड़ियां लाते हैं। मान्यता है कि वही छड़ी उपयोग में लाई जाती है जो एक ही कुल्हाड़ी के वार में कट जाए। इसके बाद रंग पंचमी के दिन इन बांस की छड़ियों की मां भवानी के सामने विधि-विधान से पूजा की जाती है।
पूजा के बाद गांव की कुंवारी कन्याएं इन अभिमंत्रित छड़ियों को माता को पांच बार स्पर्श कराती हैं और फिर मंदिर परिसर में देवी-देवताओं पर भी छड़ियां बरसाती हैं। इसके बाद यही छड़ियां लेकर कन्याएं मंदिर के बाहर खड़े लोगों, बच्चों और ग्रामीणों को प्रतीकात्मक रूप से मारती हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि इस छड़ी का स्पर्श होने से बीमारियां दूर रहती हैं और गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है। यही वजह है कि यहां लोग खुशी-खुशी छड़ी खाने के लिए भी खड़े रहते हैं और कोई भी इसे बुरा नहीं मानता।
ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा कई सौ सालों से चली आ रही है और आज भी पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है। रंग-गुलाल और आस्था के साथ मनाई जाने वाली पंतोरा की यह लट्ठमार होली आज इस गांव की खास पहचान बन चुकी है




