
भरत सिंह चौहान की रिपोर्ट
आज हम आपको विकास की वो तस्वीर दिखाने जा रहे हैं जिसे देखकर आप दंग रह जाएंगे। छत्तीसगढ़ सरकार करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने का दावा करती है, लेकिन हकीकत में ये पैसा सड़कों के ‘गड्ढों’ में डूब रहा है!
दो जिलों का मिलन या मौत को निमंत्रण? जी हा ये तस्वीरें बलौदाबाजार और जांजगीर-चांपा को जोड़ने वाले मुख्य मार्ग की हैं। **साबरी सेतु, जिसे क्षेत्र की जीवनरेखा होना चाहिए था, आज वो मौत का जाल बन चुका है। गिधौरी सड़क पर इतने बड़े गड्ढे हैं कि उन्हें देखकर समझ नहीं आता कि ये मुख्य मार्ग है या कोई मछली पालन का तालाब! ….जरा देखिए इन तस्वीरों को! यहां से गुजरना किसी जंग जीतने से कम नहीं है। दो जिलों को जोड़ने वाली ये सड़क पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। लोग अपनी जान हथेली पर रखकर यहां से गुजरने को मजबूर हैं। आए दिन यहां दुर्घटनाएं हो रही हैं, मासूम लहूलुहान हो रहे हैं, लेकिन PWD विभाग के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। जब भी मीडिया सवाल उठाता है या जनता का गुस्सा फूटता है, तो विभाग के अधिकारी क्या करते हैं? भ्रष्टाचार की नई परत बिछा देते हैं! गड्ढों में सिर्फ गिट्टी डालकर ‘खानापूर्ति’ कर दी जाती है। ये जनता के टैक्स के पैसे का बंदरबांट नहीं तो और क्या है? शिवरीनारायण, जिसे हम धर्म की नगरी कहते हैं, वहां विकास के नाम पर भ्रष्टाचार का खुला नंगा नाच हो रहा है। अब सवाल उन जिम्मेदार नेताओं से है जो चुनाव के वक्त हाथ जोड़कर सड़कें चकाचक करने का वादा करते हैं। आज जब साबरी सेतु दम तोड़ रहा है, तो आपकी आवाज कहां खो गई? क्या आप किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहे हैं? या फिर एसी कमरों में बैठकर फाइलों पर सिर्फ विकास की इबारत लिखी जा रही है?
एक तरफ राज्य सरकार सड़क मरम्मत के नाम पर करोड़ों का बजट जारी करती है, दूसरी तरफ जमीन पर ये ‘सड़क के तालाब’ सरकार के दावों का मजाक उड़ा रहे हैं। क्या मुख्यमंत्री जी के ‘सुशासन’ की यही परिभाषा है? जहां अफसर बेलगाम हैं और ठेकेदार सिर्फ अपनी तिजोरी भरने में मस्त हैं?…. आज ग्रैंड न्यूज़ सीधे तौर पर प्रशासन को चुनौती देता है। साबरी सेतु की ये जर्जर हालत छत्तीसगढ़ के विकास पर एक बदनुमा दाग है। अगर जल्द ही इस सड़क का कायाकल्प नहीं हुआ, तो जनता का ये आक्रोश सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं रहेगा। हम चैन से नहीं बैठेंगे जब तक जिम्मेदार अधिकारी और खामोश बैठे नेता अपनी नींद से जाग नहीं जाते।
देखना अब यह है कि इस खबर के बाद शासन-प्रशासन की कुंभकर्णी नींद टूटती है या फिर इस भ्रष्टाचार के खेल में अधिकारियों को बचाने का पुराना सिलसिला ही जारी रहेगा?




