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बिहार: एक DM जिन्हें भीड़ ने मार डाला; कुली से पत्रकार, क्लर्क और फिर IAS बने, एक शव यात्रा में फंसी कार और…

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सार

विस्तार

बिहार की सियासत में इन दिनों एक नाम काफी गूंज रहा है। वह नाम है आनंद मोहन का। आनंद मोहन के साथ  IAS जी कृष्णैया का नाम भी सुर्खियों में है। गोपालगंज के डीएम, जिन्हें भीड़ ने पीट-पीटकर 1994 में मार डाला था।

भीड़ को उकसाने वाले माफिया से नेता बने आनंद मोहन को गुरुवार को बिहार सरकार ने रिहा कर दिया। इस रिहाई के लिए सरकार ने जेल के नियमों को भी बदल दिया। अब इसी पर विवाद छिड़ा हुआ है।

बिहार के ज्यादातर राजनीतिक दल आनंद महोन की रिहाई को जायज ठहरा रहे हैं। वहीं, आईएएस एसोसिएशन ने इस रिहाई के खिलाफ आवाज उठाई है। इसके साथ ही बसपा, आईएमआईएम जैसे दल भी इस रिहाई को गलत बता रहे हैं।

इन सबके बीच लोग उस आईएएस अफसर की कहानी जानना चाहते हैं, जिन्हें भीड़ ने मार डाला था। आइए बताते हैं कि कैसे एक गरीब परिवार से निकलकर जी कृष्णैया ने देश की सबसे बड़ी प्रशासनिक परीक्षा पास की? कैसा उनका परिवार रहा है?

Story of Dalit DM G krishnaiah lynched by a mob in bihar Coolie turned journalist, clerk and then IAS
गोपालगंज के डीएम रहे जी कृष्णैया की तस्वीर के साथ उनकी पत्नी और उनकी हत्या के आरोपी आनंद मोहन।
पिता कुली थे, आर्थिक तंगी के चलते कृष्णैया ने भी किया काम 
जी कृष्णैया तेलंगाना के महबूबनगर के भूमिहीन दलित परिवार से थे। पिता कुली का काम करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इसके चलते पिता के साथ कृष्णैया भी पढ़ाई के साथ कुली का काम करने लगे। दिन में कुली का काम और फिर रात में पढ़ाई करते थे। बाद में उन्होंने पत्रकारिता भी की।

कृष्णैया के परिवार के सदस्य बताते हैं कि पत्रकारिता के साथ-साथ भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। इसी के चलते सरकारी दफ्तर में क्लर्क की नौकरी भी लग गई, लेकिन कृष्णैया का सपना बड़ा था। वह यहीं नहीं रुकने वाले थे। उन्होंने सिविल सर्विसेज की परीक्षा में बैठने का मन बनाया।

Story of Dalit DM G krishnaiah lynched by a mob in bihar Coolie turned journalist, clerk and then IAS
जी कृष्णैया और उनकी पत्नी
1985  में पास की सिविल सर्विसेज परीक्षा
आर्थिक संकट के चलते वह दिन में काम करते थे और रात में पढ़ाई। आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई। 1985 में उन्होंने सिविल सर्विसेज परीक्षा पास कर ली। वह आईएएस अफसर बन गए। उन्हें बिहार कैडर मिला। कहा जाता है कि वह गरीबों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। इसके चलते कम दिनों में ही वह लोकप्रिय हो गए। ट्रेनिंग के बाद कृष्णैया को पहली पोस्टिंग पश्चिमी चंपारण में मिली। इस इलाके में डकैतों का आतंक था। बड़ी मेहनत से यहां उन्होंने गरीबों के लिए खूब काम किया। 1994 में उन्हें गोपालगंज का जिलाधिकारी बना दिया गया।

…और फिर जातिगत संघर्ष का शिकार बन गए कृष्णैया 
बात पांच दिसंबर 1994 की है। जी कृष्णैया की तैनाती बिहार के गोपालगंज में थी। वह गोपालगंज के जिलाधिकारी हुआ करते थे। उन दिनों सूबे में चुनाव का माहौल था। वह पटना से एक चुनावी बैठक में शामिल होकर वापस गोपालगंज लौट रहे थे।

उसी समय माफिया कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला की शव यात्रा में उनकी कार फंस गई। छोटन की शव यात्रा में हजारों की भीड़ उमड़ी थी। कौशलेंद्र बाहुबली आनंद मोहन की पार्टी बीपीपी के टिकट पर केसरिया सीट से चुनाव लड़ने वाला था। एक दिन पहले ही उसे और उसके चार समर्थकों की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई थी। ये राजनीतिक हत्या थी।

कृष्णैया को गाड़ी में देखते ही लोगों ने घेर लिया। अचानक भीड़ आगबबूला हो गई। कृष्णैया को देख भीड़ में से किसी ने आवाज दी…भुटकुनवा(छोटन का भाई)…ले लो बदला… इहे हउवे डीएमवा…। फिर क्या था, भीड़ ने डीएम की कार पर हमला कर दिया।

जिलाधिकारी कृष्णैया को इतना पीटा कि उनकी मौके पर ही मौत हो गई। करीब चार से पांच घंटे बाद पुलिस ने डीएम के शव को अपने कब्जे में लिया। पूरे जिले में कर्फ्यू लगा दिया गया। इस मामले में पुलिस ने भीड़ को उकसाने का आरोप आनंद मोहन पर लगाया।

2007 में अदालत ने आनंद मोहन को मौत की सजा सुनाई। हालांकि, एक साल बाद पटना उच्च न्यायालय ने मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। पिछले 15 साल से वह बिहार की सहरसा जेल में सजा काट रहा था। अब बिहार सरकार ने जेल नियमों में संशोधन कर दिया है। इस संशोधन के चलते आनंद मोहन को गुरुवार को रिहा कर दिया।