शिक्षा के मंदिर से आई एक तस्वीर ने खोली सिस्टम की पोल, जिन मासूम हाथों में कलम और किताबें होनी चाहिए थीं, उन्हीं नन्हे कंधों पर लकड़ियों का बोझ,देखिए वीडियो

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शिक्षा के मंदिर से आई एक तस्वीर ने सिस्टम की पोल खोल दी है। जिन मासूम हाथों में कलम और किताबें होनी चाहिए थीं, उन्हीं नन्हे कंधों पर लकड़ियों का बोझ लदा दिखScreenshot 20260227 124010 Gallery

रहा है। मामला पेंड्रा के चुकतीपानी के बाजारडाँड़ स्थित शासकीय प्राथमिक विद्यालय का है, जहाँ बच्चों से पढ़ाई के समय मजदूरी कराए जाने का गंभीर आरोप सामने आया है।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि छोटे-छोटे स्कूली बच्चे जंगल से लकड़ियाँ ढोकर स्कूल ला रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह वीडियो स्कूल समय का ही है। जब बच्चों से पूछा गया तो उन्होंने मासूमियत से बताया कि मध्यान्ह भोजन बनाने के लिए उनसे लकड़ियाँ मंगवाई गई थीं। यानी “पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया” का नारा यहाँ “ढोएगा बच्चा, तभी जलेगा चूल्हा” में बदलता नजर आ रहा है।

एक ओर बच्चे परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं, दूसरी ओर स्कूल प्रबंधन उनसे ईंधन जुटाने का काम करवा रहा है। सवाल यह है कि क्या सरकारी योजनाओं का लाभ कागजों तक ही सीमित है? क्या मध्यान्ह भोजन योजना में ईंधन की व्यवस्था भी बच्चों के भरोसे है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या शिक्षा विभाग को इन हालात की कोई खबर नहीं थी, या फिर हमेशा की तरह “वीडियो सामने आने” का इंतजार किया जा रहा था?

मामला तूल पकड़ने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने कहा कि वीडियो उनके संज्ञान में आया है और यह बेहद निंदनीय है। उन्होंने जांच कर संबंधित स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही है। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय रहते निरीक्षण और निगरानी होती, तो शायद बच्चों को मजदूर नहीं बनना पड़ता।

फिलहाल, यह घटना शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है—क्या दूरदराज और आदिवासी इलाकों के बच्चों का बचपन ऐसे ही जिम्मेदारियों के बोझ तले दबता रहेगा, या जिम्मेदार कुर्सियों पर बैठे लोग भी कभी अपने कर्तव्यों का बोझ उठाएंगे?