छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी से बार-बार दुष्कर्म करने के मामले में दोषी ठहराए गए पिता की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिविजन बेंच ने आरोपी मिलन भारती की अपील खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने माना कि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय, स्वाभाविक और लगातार एक जैसी रही है तथा उसे मेडिकल, फॉरेंसिक और अन्य साक्ष्यों से भी पर्याप्त समर्थन मिला है।दरअसल मामला 2019 का है। पीड़िता के दादा ने सरसीवां थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि आरोपी ने अपनी नाबालिग बेटी के साथ बार-बार दुष्कर्म किया। स्कूल के प्रवेश रजिस्टर से पीड़िता की जन्मतिथि 18 अगस्त 2007 साबित हुई, जिससे घटना के समय उसकी उम्र 18 वर्ष से कम होना प्रमाणित हुआ। हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट के तहत बच्चे की उम्र तय करने में विश्वसनीय स्कूल रिकॉर्ड महत्वपूर्ण साक्ष्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि POCSO की धारा 29 के तहत जब अभियोजन नाबालिग होने और अपराध के बुनियादी तथ्यों को विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित कर देता है, तो वैधानिक अनुमान आरोपी के खिलाफ जाता है। आरोपी केवल इनकार और झूठे फंसाने की दलील देकर इस अनुमान को नहीं तोड़ सका।हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि नाबालिग से यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की विश्वसनीय गवाही अकेले भी दोषसिद्धि का आधार बन सकती है। इस मामले में पीड़िता की गवाही को उसकी मां, दादा और मेडिकल व दस्तावेजी साक्ष्यों से भी समर्थन मिला। इसलिए कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा IPC की धारा 376(2)(f), 376(2)(i) और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। आरोपी जेल में है और उसे बाकी सजा जेल में ही काटनी होगी।






