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मां मड़वारानी : आस्था की पहाड़ी पर राजनीति का अंधेरा

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देश का पहला देवी मंदिर, जहां पंचमी से शुरू होती है नवरात्र, लेकिन प्रशासन और नेताओं की रुकावट से अधर में ट्रस्ट

कोरबा। छत्तीसगढ़ की धरती देवी-देवताओं की अनगिनत गाथाओं से भरी है। इन्हीं में से एक है मां मड़वारानी मंदिर, जिसकी परंपरा और मान्यता देशभर में अनोखी मानी जाती है पहाड़ियों पर विराजमान मां मड़वारानी मंदिर सिर्फ आस्था और परंपरा का केंद्र नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक खींचतान का भी शिकार बन चुका है। यह देश का पहला ऐसा मंदिर है जहां नवरात्र की शुरुआत प्रथमा से नहीं बल्कि पंचमी तिथि से होती है।

मंडप से रूठकर बनीं ‘मां मड़वारानी’

किंवदंती है कि देवी की शादी दो जगह तय कर दी गई थी। जब दोनों बारातें पिवरी गांव पहुंचीं तो मां असमंजस में पड़ गईं और मंडप से रूठ गईं।
उन्होंने पिवरी के कुएं में शरीर पर लगी हल्दी धोई और सीधे पहाड़ की ओर चली गईं। तभी से वे ‘मां मड़वारानी’ कहलाने लगीं।

भगवान शिव भी नहीं मना पाए

मां को मनाने स्वयं भगवान शिव आए, लेकिन उन्होंने उनकी भी बात नहीं मानी। तब शिव वहीं कनकी के पास विराजमान हो गए, जिसे आज कनकेश्वर धाम कहा जाता है। यहां महाशिवरात्रि और सावन में विशाल मेले का आयोजन होता है।

पिवरी की अद्भुत घटना

नवरात्र में आज भी पिवरी में अपने आप जावा (अंकुरित अनाज) उग आता है।
वहीं, यहां आने वाले श्रद्धालुओं के हाथ-पांव हल्दी जैसे पीले हो जाते हैं। इसे मां की कृपा माना जाता है।

अनोखी परंपराएं

खरहरी गांव में नहीं होता होलिका दहन, क्योंकि होलिका को मां मड़वारानी की बहन माना जाता है।

धूल पंचमी पर मां के जंगल से बांस की टहनियां पांतोंरा ले जाकर लठमार होली खेली जाती है।

कहा जाता है कि मां के जंगल में अगर कोई राह भटक जाए तो देवी स्वयं किसी रूप में आकर सही रास्ता दिखा देती हैं।

आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम

मंदिर तीन दिशाओं से पहाड़ियों से घिरा है, जबकि चौथी ओर हसदेव नदी की तराई का नजारा मन मोह लेता है। यहां तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं –

पिवरी-बरपाली से करीब 500 सीढ़ियां चढ़कर

या मड़वारानी बस स्टैंड से 5 किमी दूरी वाहन से तय कर।

आज की स्थिति

मां मड़वारानी मंदिर की आस्था अटूट है, लेकिन राजनीतिक खींचतान ने इसके विकास की राह रोक रखी है। कांग्रेस और भाजपा के गुटों ने अलग-अलग मंदिर स्थापित कर दिए हैं, जिससे आज तक ट्रस्ट का गठन नहीं हो पाया।

निष्कर्ष

मां मड़वारानी मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और चमत्कार का प्रतीक है। लेकिन प्रशासन और नेताओं के राजनीतिक विवादों ने इसे सही दिशा में विकास नहीं होने दिया, और यह धाम अब भी अधर में लटका हुआ है।

पुजारी सुरेंद्र कुमार कंवर कहते हैं:
“मां मड़वारानी सिर्फ देवी नहीं हैं, यह हमारी आस्था, परंपरा और चमत्कार का प्रतीक हैं। नवरात्र में जब श्रद्धालु पिवरी में आते हैं और हाथ-पांव हल्दी की तरह पीले हो जाते हैं, तो यही हमें देवी की कृपा का अहसास कराता है। हर बार हजारों भक्त यहां आते हैं, विदेशों से भी लोग दर्शन करने आते हैं। यही हमारी ताकत और गर्व है।”

एक श्रद्धालु बताते हैं:
“मैं हर साल अपने परिवार के साथ मां मड़वारानी के दर्शन करने आता हूँ। पहाड़ी पर चढ़ना कठिन जरूर है, लेकिन जब मां के दर्शन होते हैं, तो सारी थकान भूल जाती है। यह अनुभव शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।”

कोरबा से सरोज रात्रे की रिपोर्ट