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संकेत साहित्य समिति द्वारा शरदोत्सव – काव्य गोष्ठी का सरस आयोजन

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अवंति विहार रायपुर के सृष्टि प्लॉजो में सुपरिचित कवयित्री पूर्वा श्रीवास्तव के संयोजन एवं संकेत साहित्य समिति के तत्वावधान में हैदराबाद से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार सत्यप्रसन्न राव के मुख्य आतिथ्य, भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.चितरंजन कर की अध्यक्षता एवं लब्धप्रतिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज के सारस्वत आतिथ्य में शरदोत्सव पर
केन्द्रित काव्य गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। इस अवसर पर जितेन्द्र श्रीवास्तव एवं गणेशदत्त झा विशेष रूप से उपस्थित रहे। माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्जवलन के पश्चात अतिथियों का अंगवस्त्र एवं श्रीफल से स्वागत किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में विषय की प्रस्तावना देते हुए संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने शरदोत्सव की महत्ता पर प्रकाश डाला।अपने सारगर्भित उद्बोधन में डॉ. चितरंजन कर ने कहा कि शब्द ब्रह्म है उसमें ईश्वर का वास होता है। सत्यप्रसन्न ने साहित्यिक आयोजनों की प्रासंगिकता पर संक्षेप में विचार व्यक्त किया। गिरीश पंकज ने कहा कि ऐसी आत्मीय गोष्ठी कम देखने को मिलती है। जहाँ सत्य हो और प्रसन्नता भी हो। प्रतिष्ठित कवयित्री पल्लवी झा के सफल संचालन में जिन रचनाकारों ने काव्य पाठ किया उनमें डॉ.चितरंजन कर , सत्यप्रसन्न राव, गिरीश पंकज ,डॉ माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’,सुरेन्द्र रावल , संजीव ठाकुर ,राजेश जैन ‘राही’, माधुरी कर, डॉ.दीनदयाल साहू, शशि सुरेन्द्र दुबे, शशांक खरे, पल्लवी झा, पूर्वा श्रीवास्तव, सुषमा पटेल, सीमा पांडे, डॉ. सीमा निगम, बीबीपी मोदी, श्रवण चोरनेले , छबिलाल सोनी एवं एकता शर्मा के नाम प्रमुख हैं। पढ़ी गईं रचनाओं के कुछ अंश दृष्टव्य हैं-
● मेरी कल्पना के गांव में ,सीधी सरल हो हर गली। जहां सबको चैनों सुकूँ मिले ,हर राही को लागे भली। – छबिलाल सोनी
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● नैना हैं जादू भरे,मधुर-मधुर मुस्कान।
बंसी अधरों पर सजी,देती सुंदर तान।
पल्लवी झा(रूमा)
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● तुम दोस्त हो तुम प्यार हो / तुम ज़िंदगी का सार हो। निश्छल भी हो, शीतल भी हो /नैया हो तुम पतवार हो।
पूर्वा श्रीवास्तव
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● पूनम तिथि नभ से झरे, सुधा बूँद रसधार।
शरद पूर्णिमा में मिले, कृष्ण नाम सुखसार।।
सुषमा पटेल
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● यूं गले मिलने से क्या फायदा ,
बंद पलके ही बहुत है किसी के दीदार के लिए।
डॉ.सीमा निगम
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● सुनों बेटियों अब आँखें खोलो,
मेरा प्रेमी ऐसा नहीं है अब मत बोलो ।
शशि दुबे
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● हे शरद पूनम के चांद / क्या इस चांदनी में बरसा पाओगे तुम सुधा की वो बूंदे / जो मृतप्राय हो गई मानवता को / फिर से अमरता का वरदान दे जाएं
सीमा पाण्डेय
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● पुस्तक मत पढ़िए , पुस्तक लिखने के लिए / इंसान को देखकर लीखिए / इंसानियत को ज़िंदा रखने के लिए
माधुरी कर
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● छालों को विश्राम मिलेगा ।चलने पर सुख-धाम मिलेगा। काम करेंगे अच्छे- अच्छे ,अच्छा सा सा परिणाम मिलेगा।
राजेश जैन ‘राही’
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● आज राजनीति हर जगह घुसी है ।देखिए न मंत्री जी की तस्वीर शौचालय में टँगी है।
शशांक खरे
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● असमंजस में हूं किधर जाऊं / कैसा जमाना आ गया /हांथो में लाठी ,डंडा , पत्थर /सर को बचाऊं या बचाऊं धड़/
किधर जाऊं. – बी.बी.पी.मोदी
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● इस लौकिक संसार में, खाली मिले न कोय। प्रेम भाव सेवा लिए, कुछ सद गुण को बोय। – श्रवण चोरनेले ‘श्रवण’
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● माटी म उपजे , माटी म बाढ़े ,माटी म लिखे तोर नाव रे। झन छोड़ जाते गाँव रे संगी । डॉ.दीनदयाल साहू
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● हाल का मेरे कुछ पता भी नहीं , आज मेरे कमरे में आईना भी नही। कैसी दोस्ती, कैसी दुश्मनी तुझसे, मैं तुझको ठीक से जानता भी नही,
संजीव ठाकुर
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● कविता का हाथ थाम हर कवि आया है।
ऐसा सुंदर पूर्णिमा का चाँद चमचमाया है।
सुरेंद्र रावल
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● गिरते -गिरते सँभलने लगा चन्द्रमा,
देखकर तुमको चलने लगा चन्द्रमा।
डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
● आज शरद की रात, आज अमृत बरसेगा। तृप्त-भाव से ले परसादी,
हर व्यक्ति का मन हरषेगा।।
गिरिश पंकज
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● “धरती के आलिंगन में है, रेशा-रेशा ये जुन्हाई। आग लगा दे पानी में भी, मादक मौसम की अँगड़ाई।. – सत्यप्रसन्न
● जितनी बार तुम्हें देखा है , तुम हर बार नये लगते हो । मन के अंदर रहते हो तुम ,क्यों फिर जुदा हुए लगते हो। डॉ.चितरंजन कर
कार्यक्रम के अंत में सीमा पांडे ने आमंत्रित अतिथियों एवं रचनाकारों के प्रति संकेत की ओर से आभार व्यक्त किया।